वैद्यवृत्तिचतुर्विधा
१. पाठस्य आधारेण अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत|
(पाठ के आधार पर नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर लिखिए)
(क) धर्मसाधनविषये महाकविना कालिदासेन उक्तं वाक्यं किम् ? (धर्म साधन के विषय में महाकवि कालिदास द्वारा कहा गया वाक्य क्या है?)
उत्तरम् : धर्मसाधनविषये महाकविना कालिदासेन उक्तं वाक्यम् अस्ति – “शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्” इति। (धर्म साधन के विषय में महाकवि कालिदास द्वारा कहा गया वाक्य है – “शरीर ही धर्म पालन का पहला साधन है।”)
(ख) आयुर्वेदे के विषयाः विचार्यन्ते ? (आयुर्वेद में किन विषयों पर विचार किया जाता है?)
उत्तरम् आयुर्वेदे चिकित्सासम्बद्धाः सर्वेऽपि विषयाः (हिताहितं, सुखं, दुःखम्, आयुः च) विचार्यन्ते। (आयुर्वेद में चिकित्सा से संबंधित सभी विषयों (हित-अहित, सुख, दुःख और आयु) पर विचार किया जाता है।)
(ग) चिकित्सायाः चत्वारः पादाः के ? (चिकित्सा के चार चरण/अंग कौन-कौन से हैं?)
उत्तरम् : वैद्यः, व्याध्युपसृष्टः (रोगी), भेषजम् (औषधम्), परिचारकः च इति चिकित्सायाः चत्वारः पादाः सन्ति। (वैद्य (चिकित्सक), रोगी, औषधि और परिचारक (सेवक)—ये चिकित्सा के चार चरण/अंग हैं।)
(घ) गुणवान् भिषक् अल्पेन कालेन किं साधयेत् ? (गुणवान वैद्य थोड़े ही समय में क्या सिद्ध/ठीक कर सकता है?)
उत्तरम् : गुणवान् भिषक् त्रिभिः गुणवद्भिः पादैः महान्तम् अपि व्याधिम् अल्पेन कालेन साधयेत्। (गुणवान वैद्य अन्य तीन गुणवान चरणों की सहायता से बड़े से बड़े रोग को भी थोड़े ही समय में ठीक कर सकता है।)
(ङ) अत्यम्बुपानात् कः दोषः सम्भवति ? (अत्यधिक जल पीने से क्या दोष/कठिनाई होती है?)
उत्तरम् : अत्यम्बुपानात् अन्नं न विपच्यते (अजीर्णता भवति)। (अत्यधिक जल पीने से भोजन नहीं पचता है (अजीर्णता होती है)।)
2. रिक्तस्थानानि पूरयत —
रिक्त स्थान भरिए
(क) ______ विषये विशेषतो अवधानं कर्तव्यम्।
उत्तर : स्वास्थ्यस्य विषये विशेषतो अवधानं कर्तव्यम्।
हिंदी अर्थ: स्वास्थ्य के विषय में विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए।
(ख) आयुर्वेदे चिकित्सायाः ______ अवयवाः उक्ताः।
उत्तर : आयुर्वेदे चिकित्सायाः चत्वारः अवयवाः उक्ताः।
हिंदी अर्थ: आयुर्वेद में चिकित्सा के चार अंग बताए गए हैं।
(ग) ______ अन्नं न विपच्यते।
उत्तर : अत्यम्बुपानात् अन्नं न विपच्यते।
हिंदी अर्थ: बहुत अधिक पानी पीने से भोजन नहीं पचता।
(घ) नरः ______ मुहुर् मुहुः अभूरि वारि पिबेत्।
उत्तर : नरः वह्निविवर्धनाय मुहुर् मुहुः अभूरि वारि पिबेत्।
हिंदी अर्थ: मनुष्य को पाचन-अग्नि बढ़ाने के लिए बार-बार थोड़ी मात्रा में पानी पीना चाहिए।
(ङ) चिकित्सकस्य आर्त्तेषु मैत्री ______ च भवेत्?
उत्तर : चिकित्सकस्य आर्त्तेषु मैत्री कारुण्यं च भवेत्।
हिंदी अर्थ: चिकित्सक को दुःखी रोगियों के प्रति मित्रता और दया रखनी चाहिए।
3. रेखाङ्कितपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत —
रेखांकित पदों के आधार पर प्रश्न बनाइए
(क) चिकित्सायाः चत्वारः पादाः उक्ताः सन्ति। (चिकित्सा के चार अंग बताए गए हैं।)
प्रश्न : चिकित्सायाः कति पादाः उक्ताः सन्ति? (चिकित्सा के कितने चरण (अंग) कहे गए हैं?)
(ख) भिषक् अल्पेन कालेन महान्तमपि व्याधिं साधयेत्। (गुणवान वैद्य थोड़े समय में बड़े से बड़े रोग को भी ठीक कर सकता है।)
प्रश्न : कः अल्पेन कालेन महान्तमपि व्याधिं साधयेत्? (कौन थोड़े ही समय में बड़े से बड़े रोग को ठीक कर सकता है?)
(ग) शरीरस्य स्वास्थ्यस्य रक्षणाय आयुर्वेदे बहवः उत्तमाः उपायाः उक्ताः। (शरीर के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए आयुर्वेद में अनेक अच्छे उपाय बताए गए हैं।)
प्रश्न : शरीरस्य स्वास्थ्यस्य रक्षणाय कुत्र बहवः उत्तमाः उपायाः उक्ताः? (शरीर के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए किसमें बहुत से उत्तम उपाय कहे गए हैं?)
(घ) अत्यम्बुपानात् अन्नं न विपच्यते। (बहुत अधिक पानी पीने से भोजन नहीं पचता है।)
प्रश्न : अत्यम्बुपानात् किम् न विपच्यते? (अत्यधिक जल पीने से क्या नहीं पचता है?)
(ङ) वैद्यानां चतुर्विधा वृत्तिः भवति। (वैद्यों की वृत्ति चार प्रकार की होती है।)
प्रश्न : केषां चतुर्विधा वृत्तिः भवति? (किनकी चार प्रकार की वृत्ति होती है?)
४. रिक्तकोष्ठकेषु उचितानि उपसर्गपदानि पूरयत-
(कोष्ठक में उचित उपसर्ग पद भरिए)
| पदम् (शब्द) | उपसर्गपदम् (उपसर्ग) | हिन्दी अर्थ |
निरुत्साहा | निर् | निर् + उत्साहा (उत्साहहीन) |
उपसृष्टः | उप | उप + सृष्टः (पीडित/ग्रस्त) |
परिचारकः | परि | परि + चारकः (सेवक) |
अत्यम्बुः | अति | अति + अम्बुः (अत्यधिक जल) |
विपच्यते | वि | वि + पच्यते (पचता है) |
निरम्बुः | निर् | निर् + अम्बुः (बिना जल के) |
विवर्धनाय | वि | वि + वर्धनाय (बढ़ाने के लिए) |
उपेक्षणम् | उप | उप + ईक्षणम् (उपेक्षा/उदासीनता) |
५. अनुच्छेदं पठित्वा अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि देयानि –
(अनुच्छेद पढ़कर नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर दीजिए)
(क) आत्रेयः कीदृशं वनस्पतिम् आनेतुं शिष्यान् प्रेषितवान् ? (आत्रेय ने कैसा पौधा लाने के लिए शिष्यों को भेजा?)
उत्तरम् : आत्रेयः तादृशं कमपि वनस्पतिम् आनेतुं शिष्यान् प्रेषितवान्, यस्य किमपि औषधीयमहत्त्वं न स्यात्। (आत्रेय ने ऐसा पौधा लाने के लिए शिष्यों को भेजा, जिसका कोई भी औषधीय महत्त्व न हो।)
(ख) प्रियशिष्यः जीवितरामः कथं प्रत्यागतवान् ? (प्रिय शिष्य जीवितराम किस प्रकार वापस आया?)
उत्तरम् : प्रियशिष्यः जीवितरामः रिक्तहस्तः प्रत्यागतवान्। (प्रिय शिष्य जीवितराम खाली हाथ वापस आया।)
(ग) खिन्नः जीवितरामः किम् अवदत् ? (दुःखी होकर जीवितराम ने क्या कहा?)
उत्तरम् : खिन्नः भूत्वा जीवितरामः अवदत् – “अहं सम्पूर्णप्रकृतौ तादृशं कमपि वनस्पतिं न प्राप्तवान्, यस्मिन् औषधीयगुणः न स्यात्” इति। (दुःखी होकर जीवितराम ने कहा – “मुझे संपूर्ण प्रकृति में ऐसा कोई भी पौधा नहीं मिला, जिसमें औषधीय गुण न हो।”)
(घ) जीवितरामस्य वचनं श्रुत्वा गुरुः किं कृतवान् ? (जीवितराम की बात सुनकर गुरु ने क्या किया?)
उत्तरम् : जीवितरामस्य वचनं श्रुत्वा गुरुः अतीव प्रसन्नः अभवत्, तं च परीक्षायां सफलं घोषितवान्। (जीवितराम की बात सुनकर गुरु बहुत प्रसन्न हुए और उसे परीक्षा में सफल घोषित कर दिया।)
(ङ) अस्य कथानकस्य सारः कः ? (इस कहानी का सार क्या है?)
उत्तरम् : अस्य कथानकस्य सारः अस्ति यत् प्रत्येकमपि वनस्पतौ कोऽपि औषधीयगुणः अवश्यमेव वर्तते। (इस कहानी का सार यह है कि प्रत्येक पौधे में कोई न कोई औषधीय गुण अवश्य होता है।)


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