कक्षा ९ · शारदा · षष्ठः पाठः
मनःपूतं समाचरेत्
सम्पूर्ण प्रश्नोत्तराणि — Complete Q&A with Hindi Translation
📖 सुभाषितानि
✍️ अभ्यासप्रश्नाः
🔤 व्याकरणम्
📚 शब्दार्थाः
✍️ अभ्यासप्रश्नाः
🔤 व्याकरणम्
📚 शब्दार्थाः
📋 विषय-सूची
- अभ्यास १ — पूर्णवाक्येन उत्तराणि (Complete Sentence Answers)
- अभ्यास २ — रिक्तस्थानपूर्तिः (Fill in the Blanks)
- अभ्यास ३ — प्रश्ननिर्माणम् (Question Formation)
- अभ्यास ४ — श्लोकाधारितप्रश्नाः (Shloka-Based Questions)
- अभ्यास ५ — मञ्जूषापूर्तिः (Box-Fill Exercise)
- अभ्यास ६ — अन्वयपूर्तिः (Anvaya Completion)
- अभ्यास ७ — मेलनम् (Matching)
- अभ्यास ८ — सन्धिविच्छेदः (Sandhi Split)
- अभ्यास ९ — समस्तपदानि (Compound Words)
अभ्यास १ — पूर्णवाक्येन उत्तराणि
निर्देशः
अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत। (नीचे दिए गए प्रश्नों का पूरे वाक्य में उत्तर लिखिए।)
अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत। (नीचे दिए गए प्रश्नों का पूरे वाक्य में उत्तर लिखिए।)
प्र. (क) — लोकः कस्य आचरणम् अनुकरोति?
(लोग किसके आचरण का अनुकरण करते हैं?)
उत्तरम् — लोकः श्रेष्ठस्य आचरणम् अनुकरोति।
(यत् यत् श्रेष्ठः आचरति, इतरः जनः तत् तत् एव आचरति।)
(यत् यत् श्रेष्ठः आचरति, इतरः जनः तत् तत् एव आचरति।)
संसार के लोग श्रेष्ठ पुरुष के आचरण का अनुकरण करते हैं। श्रेष्ठ जो-जो करता है, बाकी लोग वैसा ही करते हैं।
प्र. (ख) — कीदृशी वाणी वक्तव्या?
(कैसी वाणी बोलनी चाहिए?)
उत्तरम् — सत्यपूतां वाणीं वक्तव्या।
(सत्य से पवित्र वाणी बोलनी चाहिए।)
(सत्य से पवित्र वाणी बोलनी चाहिए।)
सत्य से पवित्र हुई वाणी बोलनी चाहिए — अर्थात जो वचन सत्य हो, शुद्ध हो, वही बोलना चाहिए।
प्र. (ग) — लक्ष्मीः कम् उपैति?
(लक्ष्मी किसके पास आती है?)
उत्तरम् — लक्ष्मीः उद्योगिनं पुरुषसिंहम् उपैति।
(लक्ष्मी परिश्रमी सिंह-पुरुष के पास आती है।)
(लक्ष्मी परिश्रमी सिंह-पुरुष के पास आती है।)
लक्ष्मी (सम्पत्ति) परिश्रमी और वीर पुरुष के पास स्वयं चलकर आती है।
प्र. (घ) — उत्तमजनाः कार्यं प्रारभ्य किं न कुर्वन्ति?
(उत्तम लोग कार्य आरंभ करके क्या नहीं करते?)
उत्तरम् — उत्तमजनाः कार्यं प्रारभ्य विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः अपि कार्यं न परित्यजन्ति।
(उत्तम लोग बार-बार बाधाएँ आने पर भी कार्य नहीं छोड़ते।)
(उत्तम लोग बार-बार बाधाएँ आने पर भी कार्य नहीं छोड़ते।)
उत्तम (श्रेष्ठ) लोग कार्य आरंभ करके, बार-बार बाधाएँ आने पर भी उसे छोड़ते नहीं — वे अंत तक प्रयास करते रहते हैं।
प्र. (ङ) — धर्मस्य लक्षणानि कानि?
(धर्म के लक्षण कौन-से हैं?)
उत्तरम् — धर्मस्य दश लक्षणानि सन्ति —
धृतिः, क्षमा, दमः, अस्तेयम्, शौचम्, इन्द्रियनिग्रहः, धीः, विद्या, सत्यम्, अक्रोधः।
एतत् दशकं धर्मलक्षणम्।
धृतिः, क्षमा, दमः, अस्तेयम्, शौचम्, इन्द्रियनिग्रहः, धीः, विद्या, सत्यम्, अक्रोधः।
एतत् दशकं धर्मलक्षणम्।
धर्म के दस लक्षण हैं — धैर्य, क्षमा, इन्द्रिय-दमन, चोरी न करना, पवित्रता, इन्द्रिय-निग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना। ये दसों मिलकर धर्म के लक्षण हैं।
प्र. (च) — सकलाः कलाः कस्मात् सिध्यन्ति?
(सभी कलाएँ किससे सिद्ध होती हैं?)
उत्तरम् — सकलाः कलाः अभ्यासात् सिध्यन्ति।
(सभी कलाएँ अभ्यास से सिद्ध होती हैं।)
(सभी कलाएँ अभ्यास से सिद्ध होती हैं।)
सभी कलाएँ अभ्यास (practice) से सिद्ध होती हैं। अभ्यास से क्रियाएँ, कलाएँ, ध्यान और मौन — सब कुछ प्राप्त हो सकता है।
प्र. (छ) — सम्पदः कं वृणते?
(सम्पत्ति किसे वरण करती हैं?)
उत्तरम् — सम्पदः विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव वृणते।
(सम्पत्ति गुणग्राही और सोच-विचारकर कार्य करने वाले को स्वयं वरण करती हैं।)
(सम्पत्ति गुणग्राही और सोच-विचारकर कार्य करने वाले को स्वयं वरण करती हैं।)
सम्पत्तियाँ उस व्यक्ति को स्वयं वरण करती हैं जो गुणों की अभिलाषी हो और जो सोच-समझकर कार्य करता हो।
अभ्यास २ — रिक्तस्थानपूर्तिः (Fill in the Blanks)
निर्देशः
अधोलिखितेषु श्लोकांशेषु रिक्तस्थानानि पूरयत। (नीचे दिए गए श्लोकांशों में रिक्त स्थान भरिए।)
अधोलिखितेषु श्लोकांशेषु रिक्तस्थानानि पूरयत। (नीचे दिए गए श्लोकांशों में रिक्त स्थान भरिए।)
प्र. (क) — …………… परमापदां पदम्।
(रिक्त स्थान भरें — ……… परम आपदाओं का स्थान है।)
उत्तरम् — अविवेकः परमापदां पदम्।
अविवेक (बिना सोचे-समझे कार्य करना) परम आपदाओं (महान संकटों) का स्थान है।
प्र. (ख) — सन्तः …………… अन्यतरद् भजन्ते।
(सज्जन लोग ……… उत्तम को स्वीकार करते हैं।)
उत्तरम् — सन्तः परीक्ष्य अन्यतरद् भजन्ते।
सज्जन लोग परीक्षा करके (जाँच-परखकर) उत्तम को स्वीकार करते हैं।
प्र. (ग) — दैवं निहत्य कुरु …………… आत्मशक्त्या।
(भाग्य को त्यागकर ……… अपनी शक्ति से करो।)
उत्तरम् — दैवं निहत्य कुरु पौरुषम् आत्मशक्त्या।
भाग्य को अतिक्रमण करके अपनी आत्मशक्ति से पुरुषार्थ (प्रयास) करो।
प्र. (घ) — स यत् …………… कुरुते।
(वह जो ……… करता है।)
उत्तरम् — स यत् प्रमाणं कुरुते।
वह श्रेष्ठ पुरुष जो प्रमाण (मानक/आदर्श) स्थापित करता है, संसार उसी का अनुसरण करता है।
प्र. (ङ) — धीर्विद्या सत्यमक्रोधो …………… धर्मलक्षणम्।
(बुद्धि, विद्या, सत्य, अक्रोध ……… धर्म का लक्षण।)
उत्तरम् — धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्।
बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध (ये सभी मिलाकर) दस धर्म के लक्षण हैं।
अभ्यास ३ — रेखाङ्कितपदाधारितप्रश्ननिर्माणम् (Question Formation)
निर्देशः
रेखाङ्कितानि पदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत। (रेखांकित पदों के आधार पर प्रश्न बनाइए।)
रेखाङ्कितानि पदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत। (रेखांकित पदों के आधार पर प्रश्न बनाइए।)
प्र. (क) — नीचैः विघ्नभयेन कार्यं न प्रारभ्यते।
(रेखांकित: नीचैः — अधम लोग)
उत्तरम् — के विघ्नभयेन कार्यं न प्रारभ्यते?
(कौन लोग विघ्नभय से कार्य आरंभ नहीं करते?)
(कौन लोग विघ्नभय से कार्य आरंभ नहीं करते?)
प्रश्न: कौन लोग बाधाओं के डर से कार्य आरंभ नहीं करते? उत्तर: अधम (नीच) लोग।
प्र. (ख) — सकलाः कलाः अभ्यासात् सिध्यन्ति।
(रेखांकित: अभ्यासात् — अभ्यास से)
उत्तरम् — सकलाः कलाः कस्मात् सिध्यन्ति?
(सभी कलाएँ किससे सिद्ध होती हैं?)
(सभी कलाएँ किससे सिद्ध होती हैं?)
प्रश्न: सभी कलाएँ किससे सिद्ध होती हैं? उत्तर: अभ्यास से।
प्र. (ग) — वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।
(रेखांकित: वस्त्रपूतं — कपड़े से छना हुआ)
उत्तरम् — कीदृशं जलं पिबेत्?
(कैसा जल पीना चाहिए?)
(कैसा जल पीना चाहिए?)
प्रश्न: कैसा जल पीना चाहिए? उत्तर: कपड़े से छानकर पवित्र किया हुआ जल।
प्र. (घ) — लक्ष्मीः पुरुषसिंहम् उपैति।
(रेखांकित: पुरुषसिंहम् — सिंह जैसे पुरुष को)
उत्तरम् — लक्ष्मीः कम् उपैति?
(लक्ष्मी किसके पास आती है?)
(लक्ष्मी किसके पास आती है?)
प्रश्न: लक्ष्मी किसके पास आती है? उत्तर: उद्योगी, परिश्रमी पुरुषसिंह के पास।
प्र. (ङ) — सन्तः परीक्ष्य अन्यतरद् भजन्ते।
(रेखांकित: परीक्ष्य — परीक्षा करके)
उत्तरम् — सन्तः कथं अन्यतरद् भजन्ते?
(सज्जन किस प्रकार स्वीकार करते हैं?)
(सज्जन किस प्रकार स्वीकार करते हैं?)
प्रश्न: सज्जन लोग उत्तम को किस प्रकार स्वीकार करते हैं? उत्तर: परीक्षा करके।
प्र. (च) — क्रियां सहसा न विदधीत।
(रेखांकित: क्रियां — कार्य को)
उत्तरम् — किं सहसा न विदधीत?
(क्या जल्दबाजी में नहीं करना चाहिए?)
(क्या जल्दबाजी में नहीं करना चाहिए?)
प्रश्न: क्या जल्दबाजी में नहीं करना चाहिए? उत्तर: किसी कार्य को जल्दबाजी में नहीं करना चाहिए।
अभ्यास ४ — श्लोकाधारित-प्रश्नोत्तराणि (Shloka-Based Q&A)
निर्देशः
अधोलिखितं श्लोकं पठित्वा प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत।
अधोलिखितं श्लोकं पठित्वा प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत।
दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।
सत्यपूतां वदेत् वाचं मनः पूतं समाचरेत्॥
सत्यपूतां वदेत् वाचं मनः पूतं समाचरेत्॥
प्र. (क) — अस्मिन् श्लोके प्रथमं क्रियापदं किम्?
(इस श्लोक में पहली क्रिया क्या है?)
उत्तरम् — अस्मिन् श्लोके प्रथमं क्रियापदम् न्यसेत् अस्ति।
इस श्लोक में पहली क्रिया ‘न्यसेत्’ है — अर्थात् रखे / स्थापित करे।
प्र. (ख) — कं न्यसेत्?
(क्या रखना चाहिए?)
उत्तरम् — पादं न्यसेत्।
(पैर रखना चाहिए — अर्थात् देखकर कदम रखना चाहिए।)
(पैर रखना चाहिए — अर्थात् देखकर कदम रखना चाहिए।)
पैर रखना चाहिए — यानी चलते समय सावधानी से देखकर कदम रखना चाहिए।
प्र. (ग) — कीदृशं पादं न्यसेत्?
(कैसा पाँव रखना चाहिए?)
उत्तरम् — दृष्टिपूतं पादं न्यसेत्।
(दृष्टि से पवित्र — देखकर पाँव रखना चाहिए।)
(दृष्टि से पवित्र — देखकर पाँव रखना चाहिए।)
आँखों से देखकर (दृष्टि से पवित्र किया हुआ) पाँव रखना चाहिए।
प्र. (घ) — द्वितीयं किं क्रियापदम् अस्ति?
(दूसरी क्रिया क्या है?)
उत्तरम् — द्वितीयं क्रियापदम् पिबेत् अस्ति।
दूसरी क्रिया ‘पिबेत्’ है — अर्थात् पीना चाहिए।
प्र. (ङ) — किं पिबेत्?
(क्या पीना चाहिए?)
उत्तरम् — जलं पिबेत्।
(जल पीना चाहिए।)
(जल पीना चाहिए।)
जल (पानी) पीना चाहिए।
प्र. (च) — कीदृशं जलं पिबेत्?
(कैसा जल पीना चाहिए?)
उत्तरम् — वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।
(कपड़े से छानकर पवित्र किया हुआ जल पीना चाहिए।)
(कपड़े से छानकर पवित्र किया हुआ जल पीना चाहिए।)
वस्त्र (कपड़े) से छानकर शुद्ध किया हुआ जल पीना चाहिए।
प्र. (छ) — तृतीयं किं क्रियापदम् अस्ति?
(तीसरी क्रिया क्या है?)
उत्तरम् — तृतीयं क्रियापदम् वदेत् अस्ति।
तीसरी क्रिया ‘वदेत्’ है — अर्थात् बोलना चाहिए।
प्र. (ज) — कां वदेत्?
(क्या बोलना चाहिए?)
उत्तरम् — वाचं वदेत्।
(वाणी बोलनी चाहिए।)
(वाणी बोलनी चाहिए।)
वाणी (बात / शब्द) बोलनी चाहिए।
प्र. (झ) — कीदृशीं वाणीं वदेत्?
(कैसी वाणी बोलनी चाहिए?)
उत्तरम् — सत्यपूतां वाणीं वदेत्।
(सत्य से पवित्र वाणी बोलनी चाहिए।)
(सत्य से पवित्र वाणी बोलनी चाहिए।)
सत्य से पवित्र हुई वाणी — अर्थात् जो सत्य हो, वैसी बात बोलनी चाहिए।
प्र. (ञ) — चतुर्थं किं क्रियापदम् अस्ति?
(चौथी क्रिया क्या है?)
उत्तरम् — चतुर्थं क्रियापदम् समाचरेत् अस्ति।
चौथी क्रिया ‘समाचरेत्’ है — अर्थात् आचरण करना चाहिए।
प्र. (ट) — कथं समाचरेत्?
(किस प्रकार आचरण करना चाहिए?)
उत्तरम् — मनःपूतं समाचरेत्।
(मन से पवित्र होकर आचरण करना चाहिए।)
(मन से पवित्र होकर आचरण करना चाहिए।)
पवित्र मन से आचरण करना चाहिए — अर्थात् मन की शुद्धि के साथ सब कार्य करने चाहिए।
अभ्यास ५ — मञ्जूषातः पदानि चित्वा भावार्थपूर्तिः
मञ्जूषा (Word Box)
बुद्धिः, लक्ष्यं, पुरुषस्य, अभिप्रायं, धीराः, नूतनम्
बुद्धिः, लक्ष्यं, पुरुषस्य, अभिप्रायं, धीराः, नूतनम्
📖 भावार्थः (क) — श्लोक ६ पर आधारित
प्र. — मञ्जूषातः पदानि चित्वा भावार्थं पूरयत।
(मञ्जूषा से पद चुनकर भावार्थ पूरा करें।)
उत्तरम् —
लक्ष्मीः प्रयत्नशीलस्य पराक्रमिणः पुरुषस्य समीपं स्वयम् आगच्छति।
कापुरुषाः तु ‘विधिः एव बलीयान्’ इति वदन्ति।
ये पौरुषेण परिस्थितिम् अतिक्रम्य कार्याणि साधयन्ति ते एव धीराः।
प्रयत्नं कृत्वा अपि यदि लक्ष्यं न प्राप्तं तर्हि तत्र दोषः नास्ति खलु।
लक्ष्मी परिश्रमी पराक्रमी पुरुष के पास स्वयं आती है। कायर लोग ‘भाग्य ही बड़ा है’ कहते हैं। जो अपने पुरुषार्थ से परिस्थितियों को पार करते हैं, वे ही धीर (वीर) हैं। प्रयत्न करके भी यदि लक्ष्य न मिले, तो वहाँ दोष नहीं।
📖 भावार्थः (ख) — श्लोक ७ पर आधारित
प्र. — मञ्जूषातः पदानि चित्वा भावार्थं पूरयत।
(मञ्जूषा से पद चुनकर भावार्थ पूरा करें।)
उत्तरम् —
पुरातनम् अस्ति इति कारणेन किमपि वस्तु समीचीनं भवेत् इति नियमः नास्ति।
तथैव नूतनम् अस्ति इति कारणेन दोषरहितं भवेत् इत्यपि नियमः नास्ति।
येषां बुद्धिः पक्वा अस्ति ते परीक्षण-निरीक्षणानन्तरम् एव उत्तमं स्वीकुर्वन्ति।
किन्तु अज्ञानाः अन्येषाम् अभिप्रायं श्रुत्वा तदनुसारेण प्रवर्तन्ते।
यह नियम नहीं कि जो पुराना है वह अच्छा है। इसी प्रकार यह भी नियम नहीं कि जो नया है वह दोषरहित है। जिनकी बुद्धि परिपक्व है, वे जाँच-परखकर उत्तम स्वीकार करते हैं। परंतु अज्ञानी लोग दूसरों के मत (अभिप्राय) सुनकर उसी के अनुसार चलते हैं।
अभ्यास ६ — श्लोकानाम् अन्वयेषु रिक्तस्थानपूर्तिः (Anvaya Completion)
निर्देशः
श्लोकानाम् अन्वयेषु रिक्तस्थानानि पूरयत। (श्लोकों के अन्वय में रिक्त स्थान भरिए।)
श्लोकानाम् अन्वयेषु रिक्तस्थानानि पूरयत। (श्लोकों के अन्वय में रिक्त स्थान भरिए।)
📖 (क) — श्लोक ४ का अन्वय (अभ्यास श्लोक)
प्र. — सर्वाः ……….. अभ्यासेन (सिध्यन्ति)। ……….. कलाः अभ्यासात् (सिध्यन्ति)। ध्यानमौनादि (अपि) ……….. (सिध्यति)। अभ्यासस्य ……….. किम् (अस्ति)?
(अन्वय के रिक्त स्थान भरें।)
उत्तरम् —
सर्वाः क्रियाः अभ्यासेन (सिध्यन्ति)।
सकलाः कलाः अभ्यासात् (सिध्यन्ति)।
ध्यानमौनादि (अपि) अभ्यासात् (सिध्यति)।
अभ्यासस्य दुष्करं किम् (अस्ति)?
सर्वाः क्रियाः अभ्यासेन (सिध्यन्ति)।
सकलाः कलाः अभ्यासात् (सिध्यन्ति)।
ध्यानमौनादि (अपि) अभ्यासात् (सिध्यति)।
अभ्यासस्य दुष्करं किम् (अस्ति)?
सभी क्रियाएँ अभ्यास से सिद्ध होती हैं। सभी कलाएँ अभ्यास से। ध्यान, मौन आदि भी अभ्यास से सिद्ध होते हैं। अभ्यास के लिए कठिन क्या है?
📖 (ख) — श्लोक ३ का अन्वय (गीता श्लोक)
प्र. — श्रेष्ठः यत् यत् ……….. इतरः जनः तत् तत् एव (आचरति)। सः यत् ……….. कुरुते, लोकः तत् ……….।
(अन्वय पूरा करें।)
उत्तरम् —
श्रेष्ठः यत् यत् आचरति इतरः जनः तत् तत् एव (आचरति)।
सः यत् प्रमाणं कुरुते, लोकः तत् अनुवर्तते।
श्रेष्ठः यत् यत् आचरति इतरः जनः तत् तत् एव (आचरति)।
सः यत् प्रमाणं कुरुते, लोकः तत् अनुवर्तते।
श्रेष्ठ जो-जो आचरण करता है, बाकी लोग भी वैसा ही करते हैं। वह जो प्रमाण (आदर्श) स्थापित करता है, संसार उसका अनुसरण करता है।
अभ्यास ७ — यथोचितं मेलनं कुरुत (Matching)
निर्देशः
श्लोकांशः और स्रोतग्रन्थ का उचित मेलन करें।
श्लोकांशः और स्रोतग्रन्थ का उचित मेलन करें।
| श्लोकांशः | स्रोतोग्रन्थः |
|---|---|
| (क) पुराणमित्येव न साधु सर्वम् | ४. मालविकाग्निमित्रम् (कालिदासः) |
| (ख) प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति | ३. नीतिशतकम् (भर्तृहरिः) |
| (ग) यद्यदाचरति श्रेष्ठः | ५. श्रीमद्भगवद्गीता (महर्षि व्यासः) |
| (घ) धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयम् | १. मनुस्मृतिः (मनुः) |
| (ङ) उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः | २. पञ्चतन्त्रम् (विष्णुशर्मा) |
स्मरणोपायः (Memory Tip)
पुराण = पुराना विषय → कालिदास (मालविकाग्निमित्रम्) ने लिखा | धृतिः क्षमा = धर्म के लक्षण → मनुस्मृतिः | उद्योगी = लक्ष्मी → पञ्चतन्त्रम् | श्रेष्ठ का अनुसरण = गीता | उत्तम नहीं छोड़ते = नीतिशतकम्
पुराण = पुराना विषय → कालिदास (मालविकाग्निमित्रम्) ने लिखा | धृतिः क्षमा = धर्म के लक्षण → मनुस्मृतिः | उद्योगी = लक्ष्मी → पञ्चतन्त्रम् | श्रेष्ठ का अनुसरण = गीता | उत्तम नहीं छोड़ते = नीतिशतकम्
अभ्यास ८ — सन्धिविच्छेदः (Sandhi Separation)
निर्देशः
रेखाङ्कितेषु पदेषु सन्धिविच्छेदं कुरुत। यथा — यो बहून्यपि साधयेत् = बहूनि + अपि
रेखाङ्कितेषु पदेषु सन्धिविच्छेदं कुरुत। यथा — यो बहून्यपि साधयेत् = बहूनि + अपि
प्र. (क) — धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयम्।
(सन्धिविच्छेद करें)
उत्तरम् — दमोऽस्तेयम् = दमः + अस्तेयम्
(विसर्ग सन्धि — दमः + अस्तेयम् = दमोऽस्तेयम्)
(विसर्ग सन्धि — दमः + अस्तेयम् = दमोऽस्तेयम्)
दमः (इन्द्रिय-दमन) + अस्तेयम् (चोरी न करना) → दमोऽस्तेयम्। यहाँ विसर्ग सन्धि है।
प्र. (ख) — पुराणमित्येव न साधु सर्वम्।
(सन्धिविच्छेद करें)
उत्तरम् — पुराणमित्येव = पुराणम् + इति + एव
पुराणम् + इति + एव → पुराणमित्येव। तीन पद मिले हैं।
प्र. (ग) — विघ्नैः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः।
(सन्धिविच्छेद करें)
उत्तरम् — पुनरपि = पुनः + अपि
(विसर्ग सन्धि — पुनः + अपि = पुनरपि)
(विसर्ग सन्धि — पुनः + अपि = पुनरपि)
पुनः (फिर) + अपि (भी) → पुनरपि। विसर्ग ‘र’ में बदल गया।
प्र. (घ) — प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति।
(सन्धिविच्छेद करें)
उत्तरम् — चोत्तमजनाः = च + उत्तम + जनाः
(च + उत्तम → चोत्तम — गुण सन्धि)
(च + उत्तम → चोत्तम — गुण सन्धि)
च (और) + उत्तम (श्रेष्ठ) + जनाः (लोग) → चोत्तमजनाः।
प्र. (ङ) — विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः।
(सन्धिविच्छेद करें)
उत्तरम् — विघ्नविहता = विघ्नैः + विहताः
(तृतीया-तत्पुरुष समास का विग्रह — विघ्नों से हत)
(तृतीया-तत्पुरुष समास का विग्रह — विघ्नों से हत)
विघ्न (बाधाओं) + विहताः (मारे गए) = विघ्नविहताः। बाधाओं से पराजित।
प्र. (च) — लोकस्तदनुवर्तते।
(सन्धिविच्छेद करें)
उत्तरम् — लोकस्तदनुवर्तते = लोकः + तत् + अनुवर्तते
(विसर्ग सन्धि — लोकः + तत् = लोकस्तत्; त् + अनु = तदनु)
(विसर्ग सन्धि — लोकः + तत् = लोकस्तत्; त् + अनु = तदनु)
लोकः (संसार) + तत् (उसी) + अनुवर्तते (अनुसरण करता है) → लोकस्तदनुवर्तते।
प्र. (छ) — सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते।
(सन्धिविच्छेद करें)
उत्तरम् — परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते = परीक्ष्य + अन्यतरत् + भजन्ते
परीक्ष्य (परीक्षा करके) + अन्यतरत् (किसी एक को) + भजन्ते (स्वीकार करते हैं)।
अभ्यास ९ — विग्रहवाक्यानि → समस्तपदानि (Compound Words)
निर्देशः
विग्रहवाक्यानि दत्तानि सन्ति। तेषां समस्तपदानि पाठात् चित्वा लिखत।
यथा — मनसा पूतं समाचरेत् → मनःपूतम्
विग्रहवाक्यानि दत्तानि सन्ति। तेषां समस्तपदानि पाठात् चित्वा लिखत।
यथा — मनसा पूतं समाचरेत् → मनःपूतम्
| विग्रहवाक्यम् | समस्तपदम् | अर्थः |
|---|---|---|
| (क) विघ्नैः विहताः (कार्यात्) विरमन्ति। | विघ्नविहताः | बाधाओं से हत — Struck by obstacles |
| (ख) वस्त्रेण पूतं जलं पिबेत्। | वस्त्रपूतम् | वस्त्र से पवित्र — Purified by cloth |
| (ग) पुरुषः सिंहः इव तम् उपैति लक्ष्मीः। | पुरुषसिंहम् | सिंह जैसा पुरुष — Lion among men |
| (घ) उत्तमाः जनाः न परित्यजन्ति। | उत्तमजनाः | उत्तम लोग — Great/Noble people |
| (ङ) न विवेकः परमापदां पदम्। | अविवेकः | विवेकहीनता — Lack of discrimination |
समास-स्मरण (Compound Memory Aid)
- विघ्नविहताः = तृतीया-तत्पुरुषसमासः (विघ्नैः विहताः)
- वस्त्रपूतम् = तृतीया-तत्पुरुषसमासः (वस्त्रेण पूतम्)
- पुरुषसिंहम् = कर्मधारयसमासः (पुरुषः एव सिंहः)
- उत्तमजनाः = कर्मधारयसमासः (उत्तमाः ये जनाः)
- अविवेकः = नञ्-तत्पुरुषसमासः (न + विवेकः)

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