धर्मश्च व्यवहारश्च चरित्रं राजशासनम्
१. एकवाक्येन उत्तरं लिखत –
एक वाक्य में उत्तर लिखिए।
(क) छात्रैः पुस्तकालयं गत्वा किं पुस्तकं दृष्टम्? (विद्यार्थियों ने पुस्तकालय जाकर कौन-सी पुस्तक देखी?)
उत्तरम् : छात्रैः पुस्तकालयं गत्वा अर्थशास्त्रम् इति पुस्तकं दृष्टम्।
(विद्यार्थियों ने पुस्तकालय जाकर ‘अर्थशास्त्र’ नामक पुस्तक देखी।)
(ख) छात्राः केन लिखितं पुस्तकं दृष्टवन्तः? (विद्यार्थियों ने किसके द्वारा लिखी गई पुस्तक देखी?)
उत्तरम् : छात्राः आचार्येण कौटिल्येन लिखितं पुस्तकं दृष्टवन्तः।
(विद्यार्थियों ने आचार्य कौटिल्य द्वारा लिखी गई पुस्तक देखी।)
(ग) अर्थशास्त्रे विशेषतः के विषयाः उक्ताः? (अर्थशास्त्र में विशेष रूप से कौन-से विषय बताए गए हैं?)
उत्तरम् : अर्थशास्त्रे आचारः, व्यवहारः, नागरिकाणां कर्तव्यानि इत्यादयः विषयाः उक्ताः।
(अर्थशास्त्र में आचरण, व्यवहार और नागरिकों के कर्तव्य आदि विषय बताए गए हैं।)
(घ) कानि संहृत्य अर्थशास्त्रं कृतम्? (किनका संकलन करके अर्थशास्त्र की रचना की गई?)
उत्तरम् : पूर्वाचार्यैः प्रस्तावितानि अर्थशास्त्राणि संहृत्य अर्थशास्त्रं रचितम्।
(पूर्वाचार्यों द्वारा बताए गए अर्थशास्त्रों का संकलन करके अर्थशास्त्र की रचना की गई।)
(ङ) राज्यस्य अङ्गानि कानि? (राज्य के अंग कौन-कौन से हैं?)
उत्तरम् : स्वामी, अमात्यः, जनपदः, दुर्गम्, कोषः, दण्डः, मित्राणि च राज्यस्य सप्ताङ्गानि सन्ति।
(राजा, मंत्री, जनपद, किला, खजाना, सेना और मित्र राज्य के सात अंग हैं।)
(च) न्यायस्य चत्वारः पादाः के? (न्याय के चार आधार कौन-से हैं?)
उत्तरम् : धर्मः, व्यवहारः, चरित्रम्, राजशासनं च न्यायस्य चत्वारः पादाः सन्ति।
(धर्म, व्यवहार, चरित्र और राजशासन न्याय के चार आधार हैं।)
(छ) अस्मिन् पाठे पठितानि ध्येयवाक्यानि चित्वा लिखत। (इस पाठ में पढ़े गए ध्येय वाक्यों को चुनकर लिखिए।)
उत्तरम् :
यतो धर्मस्ततो जयः। (जहाँ धर्म है, वहाँ विजय है)
सत्यमेव जयते। (सत्य की ही विजय होती है।)
धर्मचक्रप्रवर्तनाय। (धर्मचक्र के प्रवर्तन के लिए।)
(ज) ‘कोषपूर्वाः सर्वारम्भाः’, तस्मात् किं कर्तव्यम्? (‘सभी कार्यों का आरंभ कोष पर निर्भर है’, इसलिए क्या करना चाहिए?)
उत्तरम् : तस्मात् कोषस्य सम्यक् व्यवस्थापनं कर्तव्यम्।
(इसलिए राजकोष की उचित व्यवस्था करनी चाहिए।)
(झ) कररूपेण किं किं देयम्? (कर के रूप में क्या-क्या दिया जाना चाहिए?)
उत्तरम् : धान्यषड्भागं, पण्यदशभागं, हिरण्यं च कररूपेण देयम्।
(कर के रूप में अनाज का छठा भाग, व्यापारिक वस्तुओं का दसवाँ भाग और सोना दिया जाता था।)
२. कोष्ठके प्रदत्तानि पदानि अर्थानुसारं रिक्तस्थानेषु योजयत।
कोष्ठक में दिए गए शब्दों को अर्थ के अनुसार रिक्त स्थानों में लिखिए।
स्वामी, अमात्यः, दुर्गम्, कोषः, मित्रम्।
(क) यः शासनविषये परामर्शं यच्छति। (जो शासन के विषय में परामर्श देता है।)
उत्तरम् : अमात्यः। (मंत्री।)
(ख) यः शासनं करोति। (जो शासन करता है।)
उत्तरम् : स्वामी। (राजा।)
(ग) देशः यः मैत्रीभावेन तिष्ठति। (वह देश जो मित्रता के भाव से रहता है।)
उत्तरम् : मित्रम्। (मित्र राज्य।)
(घ) सुरक्षितं स्थानं यत्र भोजनम् अभयं च अस्ति। (सुरक्षित स्थान जहाँ भोजन और निर्भयता उपलब्ध हों।)
उत्तरम् : दुर्गम्। (किला)
(ङ) यत्र देशस्य धनधान्यादीनां सङ्ग्रहः भवति। (जहाँ देश के धन और अनाज आदि का संग्रह होता है।)
उत्तरम् : कोषः। (खजाना।)
३. अधोलिखितानां वाक्यानां पाठात् समानार्थकवाक्यानि चित्वा लिखत।
नीचे दिए गए वाक्यों के समान अर्थ वाले वाक्य पाठ से चुनकर लिखिए।
(क) धर्मः अस्ति चेत् तत्र जयः अपि भविष्यति। (जहाँ धर्म है, वहाँ विजय भी होगी।)
उत्तरम् : यतो धर्मस्ततो जयः। (जहाँ धर्म है, वहाँ विजय है।)
(ख) धर्मस्य प्रवर्तनार्थं वयं तिष्ठामः। (हम धर्म के प्रवर्तन के लिए खड़े हैं।)
उत्तरम् : धर्मचक्रप्रवर्तनाय। (धर्मचक्र के प्रवर्तन के लिए।)
(ग) निश्चितं यत् सत्यं जयति। (निश्चित रूप से सत्य की विजय होती है।)
उत्तरम् : सत्यमेव जयते। (सत्य की ही विजय होती है।)
(घ) शासकस्य प्रियं तु प्रजानां हिते भवेत्। (शासक का प्रिय कार्य प्रजा के हित में होना चाहिए।)
उत्तरम् : प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्। (राजा का सुख प्रजा के सुख में और उसका हित प्रजा के हित में है।)
(ङ) धनं विना काऽपि योजना न प्रवर्तेत। (धन के बिना कोई योजना शुरू नहीं हो सकती।)
उत्तरम् : कोषपूर्वाः सर्वारम्भाः। (सभी कार्यों का आरंभ कोष पर निर्भर होता है।)
४. अनुच्छेदं पठित्वा अधः प्रदत्तप्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत।
अनुच्छेद पढ़कर नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए।
(क) सुखार्थं जनाः किं किम् अर्जयन्ति? (सुख के लिए लोग क्या-क्या प्राप्त करते हैं?)
उत्तरम् : सुखार्थं जनाः धनं, पदवीं, साधनानि च अर्जयन्ति।
(सुख के लिए लोग धन, पद और साधन प्राप्त करते हैं।)
(ख) सुखस्य मूलं ………….. अस्ति। (सुख का मूल ………….. है।)
उत्तरम् : सुखस्य मूलं धर्मः अस्ति।
(सुख का मूल धर्म है।)
(ग) जितात्मा किं प्राप्नोति? (जिसने अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली है, वह क्या प्राप्त करता है?)
उत्तरम् : जितात्मा इच्छानुसारं फलानि प्राप्नोति।
उत्तर (हिंदी): आत्मसंयमी व्यक्ति अपनी इच्छानुसार फल प्राप्त करता है।
(घ) सुभाषिते त्रीणि क्रियापदानि सन्ति। प्रथमं ………… द्वितीयं ………… इति तृतीयं च आप्नोति इति। (सुभाषित में तीन क्रियापद हैं। पहला …………, दूसरा ………… और तीसरा ‘आप्नोति’ है।)
उत्तरम् : प्रथमं ददाति, द्वितीयं याति, तृतीयं आप्नोति इति।
(पहला ‘देता है’, दूसरा ‘प्राप्त करता है’ और तीसरा ‘प्राप्त करता है’ है।)
सुभाषितम् (श्लोक):
विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मः ततः सुखम्॥
हिंदी अर्थ: विद्या विनम्रता देती है, विनम्रता से योग्यता प्राप्त होती है, योग्यता से धन मिलता है, धन से धर्म और धर्म से सुख मिलता है।


Leave a Reply