संस्कृत • कक्षा ९ • शारदा • अष्टमः पाठः
अन्नाद् आनन्दं प्रति
तैत्तिरीयोपनिषद् — भृगु-वरुण संवादः | सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर हिन्दी अनुवाद सहित
🕉️ उपनिषद् संवादः
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🔤 लट्-लोट्-लकार
⭐ सभी अभ्यास
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📋 विषय-सूची (Table of Contents)
- प्र.१ — एकेन पदेन रिक्तस्थानं पूरयत
- प्र.२ — पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखत
- प्र.३ — सत्यम् / असत्यम् (True/False)
- प्र.४ — क्रियापदेन सह समुचितं पदं योजयत (Matching)
- प्र.५ — अवशिष्ट-धातुरूपाणि पूरयत (√वृत् लट्-लकार)
- प्र.८ — कर्तृपदानुसारं लोट्-लकारेण क्रियापदं परिवर्तयत
- श्लोकानां अन्वयः भावार्थश्च
- व्याकरण — कर्तृ-कर्मवाच्यनियमः, तव्यत्-अनीयर्-प्रत्यय
- शब्दार्थाः (Word Meanings)
प्र.१ — एकेन पदेन रिक्तस्थानं पूरयत (Fill in the Blanks)
उदाहरणम्: अन्नेन शरीरं वर्धते।
प्र. (क) ……………… शरीरं वर्धते।
(________ से शरीर बढ़ता है।)
(________ से शरीर बढ़ता है।)
उ. अन्नेन शरीरं वर्धते।
(अन्न (भोजन) से शरीर बढ़ता है।)
(अन्न (भोजन) से शरीर बढ़ता है।)
प्र. (ख) ……………… शरीरं प्रतिष्ठितम्।
(________ में शरीर स्थित है।)
(________ में शरीर स्थित है।)
उ. प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्।
(प्राण में शरीर स्थित है।)
(प्राण में शरीर स्थित है।)
प्र. (ग) ……………… विना शरीरं क्रियाशून्यं भवति।
(________ के बिना शरीर क्रियाशून्य हो जाता है।)
(________ के बिना शरीर क्रियाशून्य हो जाता है।)
उ. प्राणेन विना शरीरं क्रियाशून्यं भवति।
(प्राण के बिना शरीर क्रियाशून्य हो जाता है।)
(प्राण के बिना शरीर क्रियाशून्य हो जाता है।)
प्र. (घ) ……………… एव इमानि भूतानि जायन्ते।
(________ से ही ये सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं।)
(________ से ही ये सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं।)
उ. प्राणाद् एव इमानि भूतानि जायन्ते।
(प्राण से ही ये सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं।)
(प्राण से ही ये सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं।)
प्र. (ङ) ……………… समस्तानि इन्द्रियाणि सञ्चाल्यन्ते।
(________ से सभी इन्द्रियाँ चलती हैं।)
(________ से सभी इन्द्रियाँ चलती हैं।)
उ. मनसा समस्तानि इन्द्रियाणि सञ्चाल्यन्ते।
(मन से सभी इन्द्रियाँ चलती हैं।)
(मन से सभी इन्द्रियाँ चलती हैं।)
प्र. (च) ……………… विना बोधशक्तेः तर्कशक्तेश्च विकासो न भवति।
(________ के बिना बोधशक्ति और तर्कशक्ति का विकास नहीं होता।)
(________ के बिना बोधशक्ति और तर्कशक्ति का विकास नहीं होता।)
उ. बुद्धितत्त्वं (विज्ञानं) विना बोधशक्तेः तर्कशक्तेश्च विकासो न भवति।
(बुद्धि (विज्ञान) के बिना बोधशक्ति और तर्कशक्ति का विकास नहीं होता।)
(बुद्धि (विज्ञान) के बिना बोधशक्ति और तर्कशक्ति का विकास नहीं होता।)
प्र. (छ) ……………… एव सर्वकर्मणः प्रवर्तकम्।
(________ ही सभी कर्मों का प्रवर्तक है।)
(________ ही सभी कर्मों का प्रवर्तक है।)
उ. मनः एव सर्वकर्मणः प्रवर्तकम्।
(मन ही सभी कर्मों का प्रवर्तक (चालक) है।)
(मन ही सभी कर्मों का प्रवर्तक (चालक) है।)
प्र.२ — पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखत (Full Sentence Answers)
प्र. (क) भृगोः जिज्ञासा कस्मिन् विषये आसीत्?
(भृगु की जिज्ञासा किस विषय में थी?)
(भृगु की जिज्ञासा किस विषय में थी?)
उ. भृगोः जिज्ञासा ब्रह्मविषये आसीत्। सः पितरं वरुणं पृष्टवान् — “किं तद् ब्रह्म येन सर्वं जगदिदं सञ्चाल्यते?”
(भृगु की जिज्ञासा ब्रह्म के विषय में थी। उन्होंने पिता वरुण से पूछा — “वह ब्रह्म क्या है जिससे यह सारा जगत् चलता है?”)
(भृगु की जिज्ञासा ब्रह्म के विषय में थी। उन्होंने पिता वरुण से पूछा — “वह ब्रह्म क्या है जिससे यह सारा जगत् चलता है?”)
प्र. (ख) भृगुणा ब्रह्मज्ञानाय किम् आचरितम्?
(भृगु ने ब्रह्मज्ञान के लिए क्या किया?)
(भृगु ने ब्रह्मज्ञान के लिए क्या किया?)
उ. भृगुणा ब्रह्मज्ञानाय अनेकवर्षाणि कठोरं तपः आचरितम्। ते बारम्बारं वनं गत्वा तपश्चर्यां कृतवन्तः।
(भृगु ने ब्रह्मज्ञान के लिए अनेक वर्षों तक कठोर तप किया। वे बार-बार वन में जाकर तपस्या करते रहे।)
(भृगु ने ब्रह्मज्ञान के लिए अनेक वर्षों तक कठोर तप किया। वे बार-बार वन में जाकर तपस्या करते रहे।)
प्र. (ग) भृगुः प्रथमं तपसा ब्रह्मरूपेण किं ज्ञातवान्?
(भृगु ने पहले तप से ब्रह्म के रूप में क्या जाना?)
(भृगु ने पहले तप से ब्रह्म के रूप में क्या जाना?)
उ. भृगुः प्रथमं तपसा अन्नं वै ब्रह्म इति ज्ञातवान्। अन्नाद् एव प्राणिनः जायन्ते, अन्नेन एव जीवन्ति, अन्नेनैव शरीरं बलं च वर्धेते — अतः अन्नं ब्रह्म इति।
(भृगु ने पहले तप से जाना कि अन्न ही ब्रह्म है। अन्न से ही प्राणी जन्म लेते हैं, अन्न से ही जीते हैं और अन्न से ही शरीर और बल बढ़ता है।)
(भृगु ने पहले तप से जाना कि अन्न ही ब्रह्म है। अन्न से ही प्राणी जन्म लेते हैं, अन्न से ही जीते हैं और अन्न से ही शरीर और बल बढ़ता है।)
प्र. (घ) मनसः के जायन्ते?
(मन से क्या-क्या उत्पन्न होते हैं?)
(मन से क्या-क्या उत्पन्न होते हैं?)
उ. मनसः सङ्कल्पाः, भावाः, विचाराश्च जायन्ते। मानवः मनसा एव सर्वं कार्यं सम्पादयति।
(मन से संकल्प, भाव और विचार उत्पन्न होते हैं। मनुष्य मन से ही सभी काम करता है।)
(मन से संकल्प, भाव और विचार उत्पन्न होते हैं। मनुष्य मन से ही सभी काम करता है।)
प्र. (ङ) प्राणिनः कस्मात् जायन्ते?
(प्राणी किससे उत्पन्न होते हैं?)
(प्राणी किससे उत्पन्न होते हैं?)
उ. प्राणिनः प्राणाद् एव जायन्ते। प्राणेन जातानि जीवन्ति। प्राणशक्त्या एव शारीरिकक्रियाशक्तेः विकासो भवति।
(प्राणी प्राण से ही उत्पन्न होते हैं। प्राण से जन्मे जीते हैं। प्राणशक्ति से ही शारीरिक क्रियाशक्ति का विकास होता है।)
(प्राणी प्राण से ही उत्पन्न होते हैं। प्राण से जन्मे जीते हैं। प्राणशक्ति से ही शारीरिक क्रियाशक्ति का विकास होता है।)
प्र. (च) इन्द्रियाणि केन सञ्चाल्यन्ते?
(इन्द्रियाँ किससे चलती हैं?)
(इन्द्रियाँ किससे चलती हैं?)
उ. समस्तानि इन्द्रियाणि मनसा सञ्चाल्यन्ते। मन एव सर्वकर्मणः प्रवर्तकम्।
(सभी इन्द्रियाँ मन से चलती हैं। मन ही सभी कर्मों का चालक है।)
(सभी इन्द्रियाँ मन से चलती हैं। मन ही सभी कर्मों का चालक है।)
प्र. (छ) शरीरं कुत्र प्रतिष्ठितम् अस्ति?
(शरीर कहाँ स्थित है?)
(शरीर कहाँ स्थित है?)
उ. शरीरं प्राणे प्रतिष्ठितम् अस्ति। प्राणः हि भूतानाम् आयुः।
(शरीर प्राण में स्थित है। प्राण ही प्राणियों का जीवन है।)
(शरीर प्राण में स्थित है। प्राण ही प्राणियों का जीवन है।)
प्र. (ज) केन विना स्मृतिशक्तेः विकासो न भवति?
(किसके बिना स्मृतिशक्ति का विकास नहीं होता?)
(किसके बिना स्मृतिशक्ति का विकास नहीं होता?)
उ. बुद्धितत्त्वं (विज्ञानं) विना स्मृतिशक्तेः विकासो न भवति। बुद्धिः एव सारथिरूपेण अस्मान् कर्मणि प्रवर्तयति।
(बुद्धि (विज्ञान) के बिना स्मृतिशक्ति का विकास नहीं होता। बुद्धि ही सारथी के रूप में हमें कर्म में प्रेरित करती है।)
(बुद्धि (विज्ञान) के बिना स्मृतिशक्ति का विकास नहीं होता। बुद्धि ही सारथी के रूप में हमें कर्म में प्रेरित करती है।)
प्र. (झ) भृगुः तपसा केषां महत्त्वं ज्ञातवान्?
(भृगु ने तप से किन-किन का महत्त्व जाना?)
(भृगु ने तप से किन-किन का महत्त्व जाना?)
उ. भृगुः तपसा अन्नस्य, प्राणस्य, मनसः, विज्ञानस्य, आनन्दस्य च महत्त्वं ज्ञातवान्। एतैः पञ्चभिः एव अस्माकं पूर्णविकासो भवति।
(भृगु ने तप से अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनन्द — इन पाँचों का महत्त्व जाना। इन पाँचों से ही हमारा पूर्ण विकास होता है।)
(भृगु ने तप से अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनन्द — इन पाँचों का महत्त्व जाना। इन पाँचों से ही हमारा पूर्ण विकास होता है।)
प्र.३ — सत्यम् / असत्यम् (True / False)
उदाहरणम्: प्रस्तुते पाठे पितापुत्रयोः संवादः अस्ति → सत्यम्
| कथनम् | सत्यम् / असत्यम् | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| (क) प्रस्तुते पाठे पितापुत्रयोः संवादः अस्ति | सत्यम् | इस पाठ में पिता-पुत्र का संवाद है — सही |
| (ख) अस्मिन् संवादे अन्नस्य महत्त्वं वर्णितम् | सत्यम् | इस संवाद में अन्न का महत्त्व वर्णित है — सही |
| (ग) प्राणिनः मनसः जायन्ते इति कथनम् अस्ति | असत्यम् | प्राणी मन से जन्मते हैं — गलत (प्राणिनः प्राणाद् / अन्नाद् जायन्ते) |
| (घ) अन्नेन शरीरं वर्धते इति | सत्यम् | अन्न से शरीर बढ़ता है — सही |
| (ङ) मनः सारथिरूपेण अस्मान् कर्मणि प्रवर्तयति | असत्यम् | मन सारथि है — आंशिक रूप से गलत (पाठानुसार बुद्धिः एव सारथिरूपेण कर्मणि प्रवर्तयति) |
| (च) भृगुः वरुणस्य पुत्रोऽस्ति | सत्यम् | भृगु वरुण के पुत्र हैं — सही |
| (छ) भृगुः तपसा मनो ब्रह्मरूपेण ज्ञातवान् | सत्यम् | भृगु ने तप से मन को ब्रह्म जाना — सही |
| (ज) विना योगे तृतीया विभक्तिः भवति | सत्यम् | “विना” के साथ तृतीया विभक्ति होती है — सही |
प्र.४ — क्रियापदेन सह समुचितं पदं योजयत (Match Words with Verbs)
| पदम् | समुचितं क्रियापदम् | पूर्णवाक्यम् |
|---|---|---|
| (क) प्राणिनः | ३. जायन्ते | प्राणिनः प्राणाद् जायन्ते। |
| (ख) शरीरम् | ४. वर्धते | अन्नेन शरीरं वर्धते। |
| (ग) तपः | २. कुरुताम् | ब्रह्मज्ञानाय तपः कुरुताम्। |
| (घ) पितरम् | ५. ब्रूते | भृगुः पितरं ब्रूते। |
| (ङ) यत्नः | १. क्रियताम् | ब्रह्मज्ञानाय यत्नः क्रियताम्। |
प्र.५ — अवशिष्ट-धातुरूपाणि पूरयत (Complete the Verb Forms — √वृत् लट्-लकार)
निर्देश: √वृत् धातु (आत्मनेपदी) — लट्-लकार के तीनों वचनों में रूप भरिए। उदाहरण — एकवचनम् प्रथमपुरुषः: वर्तते
√वृत् धातुः — लट्-लकारः (आत्मनेपदम्)
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुषः | वर्तते | वर्तेते | वर्तन्ते |
| मध्यमपुरुषः | वर्तसे | वर्तेथे | वर्तध्वे |
| उत्तमपुरुषः | वर्ते | वर्तावहे | वर्तामहे |
पाठ में प्रयुक्त उदाहरण: “जिज्ञासा वर्तते” (मुझे जिज्ञासा है — एकवचन प्रथमपुरुष)
प्र.६-७ — आत्मनेपदि-धातूनां लट्-लोट्-लकाररूपाणि
📖 वन्द्-धातुः (लट्-लकारः)
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथम | वन्दते | वन्देते | वन्दन्ते |
| मध्यम | वन्दसे | वन्देथे | वन्दध्वे |
| उत्तम | वन्दे | वन्दावहे | वन्दामहे |
📖 वन्द्-धातुः (लोट्-लकारः)
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथम | वन्दताम् | वन्देताम् | वन्दन्ताम् |
| मध्यम | वन्दस्व | वन्देथाम् | वन्दध्वम् |
| उत्तम | वन्दै | वन्दावहै | वन्दामहै |
📖 कृ-धातुः (लट्-लकारः आत्मनेपदम्)
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथम | कुरुते | कुर्वाते | कुर्वते |
| मध्यम | कुरुषे | कुर्वाथे | कुर्वध्वे |
| उत्तम | कुर्वे | कुर्वहे | कुर्महे |
📖 कृ-धातुः (लोट्-लकारः)
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथम | कुरुताम् | कुर्वाताम् | कुर्वताम् |
| मध्यम | कुरुष्व | कुर्वाथाम् | कुरुध्वम् |
| उत्तम | करवै | करवावहै | करवामहै |
📖 प्र.७ (अ) — मोद्-धातुः लोट्-लकारः
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथम | मोदताम् | मोदेताम् | मोदन्ताम् |
| मध्यम | मोदस्व | मोदेथाम् | मोदध्वम् |
| उत्तम | मोदै | मोदावहै | मोदामहै |
📖 प्र.७ (आ) — वृध्-धातुः लोट्-लकारः
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| प्रथम | वर्धताम् | वर्धेताम् | वर्धन्ताम् |
| मध्यम | वर्धस्व | वर्धेथाम् | वर्धध्वम् |
| उत्तम | वर्धै | वर्धावहै | वर्धामहै |
प्र.८ — कर्तृपदानुसारं लट्→लोट्-लकारेण क्रियापदं परिवर्तयत
उदाहरणम्:
लट्-लकारः: सः अन्नं सदा ईश्वरबुद्ध्या सेवते।
लोट्-लकारः: भवान् सदा अन्नम् ईश्वरबुद्ध्या सेवताम्।
लट्-लकारः: सः अन्नं सदा ईश्वरबुद्ध्या सेवते।
लोट्-लकारः: भवान् सदा अन्नम् ईश्वरबुद्ध्या सेवताम्।
| लट्-लकारः (कर्तृपदम्) | लोट्-लकारः (परिवर्तित) |
|---|---|
| उदा. — सः सेवते (भवान्) | भवान् सेवताम् |
| (क) बालकः अन्नस्य निन्दां न कुरुते। (भवान्) | भवान् अन्नस्य निन्दां न कुरुताम्। |
| (ख) मम जीवने यशो वर्धते। (तव) | तव जीवने यशो वर्धताम्। |
| (ग) अहं बौद्धिकविकासाय सदा योगासनं कुर्वे। (त्वं) | त्वं बौद्धिकविकासाय सदा योगासनं कुरुष्व। |
| (घ) रमेशः सर्वदा सत्यं भाषते। (दिनेशः) | दिनेशः सर्वदा सत्यं भाषताम्। |
| (ङ) छात्रः लक्ष्यसिद्धये कष्टं सहते। (अहं) | अहं लक्ष्यसिद्धये कष्टं सहै। |
| (च) साधवः सर्वदा रमन्ते। (भवन्तः) | भवन्तः सर्वदा रमन्ताम्। |
| (छ) भवान् योगेन आरोग्यं लभते। (अहं) | अहं योगेन आरोग्यं लभै। |
| (ज) रमा सदा सत्कर्मणि यतते। (लता) | लता सदा सत्कर्मणि यतताम्। |
| (झ) भक्तः ईश्वरं वन्दते। (त्वं) | त्वं ईश्वरं वन्दस्व। |
शब्दार्थाः — सर्वं शब्देन भासते (Key Word Meanings)
| संस्कृत शब्दः | अर्थः | हिन्दी | English |
|---|---|---|---|
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