स्वाध्यायाय्ना प्रमदः (पढ़ाई करने में लापरवाही मत करो।)
इस पाठ में प्राचीन गुरुकुल शिक्षा-व्यवस्था और गुरु द्वारा शिष्यों को दिए जाने वाले महत्वपूर्ण उपदेशों का वर्णन किया गया है। प्राचीन समय में विद्यार्थी गुरुकुल में रहकर लगभग बारह वर्षों तक धर्म, दर्शन, विज्ञान, वेद और वेदांगों का अध्ययन करते थे। शिक्षा पूरी होने पर समावर्तन उत्सव होता था, जिसमें आचार्य अपने शिष्यों को जीवन में सही आचरण करने की सीख देते थे। उपनिषद् के इन उपदेशों में सत्य बोलना, धर्म का पालन करना, स्वाध्याय में लापरवाही न करना, अच्छे और निंदनीय कर्मों में अंतर करना तथा माता, पिता, गुरु और अतिथि को देवता के समान सम्मान देना बताया गया है। साथ ही जरूरतमंदों को श्रद्धा, विनम्रता, भय, लज्जा और मित्रभाव से दान देने तथा विद्वानों और श्रेष्ठ लोगों का सम्मान करने की शिक्षा दी गई है। पाठ का मुख्य संदेश है कि विद्यार्थी को जीवनभर अध्ययन, सत्य, धर्म, अच्छे आचरण और सेवा के मार्ग पर चलते रहना चाहिए।


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