योऽधीतविद्य: सकलः स सर्वेषां गुरुभवेत्
(जो व्यक्ति अच्छी तरह से विद्या प्राप्त कर लेता है, वह सभी का गुरु बन जाता है।)
अध्याय “योऽधीतविद्यः सकलः स सर्वेषां गुरुर् भवेत्” में प्राचीन भारतीय ज्ञान-परंपरा में विद्या, शास्त्र और कलाओं के महत्व को विस्तार से बताया गया है। नीतिशास्त्र को प्राचीन भारतीय अध्ययन-विषयों में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है और इसे धर्मशास्त्र का अंग कहा गया है। शक्रनीति को नीतिशास्त्र के महत्वपूर्ण ग्रंथ के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसमें राज्यव्यवस्था, दण्डनीति, अर्थनीति, प्रजापालन, शिक्षाव्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था आदि विषयों का वर्णन है तथा इसे लोककल्याण, सुशासन और आदर्श समाज की स्थापना के लिए मार्गदर्शक बताया गया है। पाठ में कहा गया है कि जिसने सभी विद्याओं का अध्ययन किया है, वही सभी का गुरु बनने योग्य है, जबकि जिसने विद्या का अध्ययन नहीं किया है, वह केवल जाति के कारण गुरु बनने योग्य नहीं हो सकता। आगे बताया गया है कि विद्याएँ और कलाएँ अनन्त हैं और उनकी पूरी संख्या निर्धारित करना संभव नहीं है, फिर भी मुख्य रूप से 32 विद्याओं और 64 कलाओं का उल्लेख किया गया है। पाठ में ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद चार वेदों तथा आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद और तन्त्रवेद चार उपवेदों का वर्णन किया गया है। वेदों के छह अंग शिक्षा, व्याकरण, कल्प, निरुक्त, ज्योतिष और छन्द बताए गए हैं। शिक्षा वर्णों की उत्पत्ति, उच्चारण, स्थान और प्रयत्न का ज्ञान कराती है, कल्प यज्ञ-कर्म की विधि बताता है, व्याकरण शब्दों की साधुता-असाधुता का ज्ञान कराता है, निरुक्त शब्दों की व्युत्पत्ति और अर्थ को स्पष्ट करता है, छन्द वैदिक छन्दों का ज्ञान देता है तथा ज्योतिष काल, ग्रह और नक्षत्रों का ज्ञान प्रदान करता है। इसके साथ ही पाठ में मीमांसा, तर्क, सांख्य, वेदान्त, योग, इतिहास, पुराण, स्मृतियाँ, नास्तिक मत, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र, शिल्प, अलंकृति, काव्य, देशभाषा, अवसर के अनुसार कही जाने वाली बात, यवनमत तथा देश आदि के धर्म को भी विद्याओं के रूप में बताया गया है। पाठ में विद्या और कला के स्वरूप को भी स्पष्ट किया गया है—जो कार्य वाणी के द्वारा ठीक प्रकार से किया जाता है वह विद्या से संबंधित माना गया है और जिसे मूक व्यक्ति भी करने में समर्थ हो सकता है, वह कला से संबंधित माना गया है। अंत में कहा गया है कि जिस राष्ट्र में लोग अपने-अपने धर्म और कर्तव्य में तत्पर रहते हैं, वह राष्ट्र श्रेष्ठ बनता है तथा जो राजा धर्म और नीति का पालन करता है, वह लंबे समय तक कीर्ति प्राप्त करता है। इस प्रकार यह अध्याय विद्या के अध्ययन, विभिन्न शास्त्रों और कलाओं के ज्ञान, अपने कर्तव्य के पालन तथा धर्म और नीति के महत्व को स्पष्ट करता है।

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