वैद्यवृत्तिचतुर्विधा (वैद्य का काम चार प्रकार का होता है)
इस अध्याय में स्वास्थ्य, आयुर्वेद, चिकित्सा और वैद्य के कर्तव्यों का वर्णन किया गया है। पाठ की शुरुआत कक्षा में आचार्य के प्रवेश से होती है। वे अनन्या को निरुत्साहित देखकर उसके स्वास्थ्य के बारे में पूछते हैं। अनन्या बताती है कि उसका स्वास्थ्य ठीक नहीं है। आचार्य स्वास्थ्य के महत्व को समझाते हुए महाकवि कालिदास के कथन “शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्” का अर्थ बताते हैं कि यदि मनुष्य धर्म का आचरण करना चाहता है, तो उसका शरीर स्वस्थ होना आवश्यक है। इसके बाद आचार्य विद्यार्थियों को बताते हैं कि शरीर के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए आयुर्वेद में अनेक उपाय बताए गए हैं।
पाठ में आयुर्वेद की परिभाषा बताते हुए कहा गया है कि जिस ज्ञान में हित और अहित, सुख और दुःख तथा आयु से संबंधित विषयों का वर्णन किया गया है, उसे आयुर्वेद कहा जाता है। आयुर्वेद में चिकित्सा से संबंधित सभी विषयों पर विचार किया जाता है। चिकित्सा के चार पाद बताए गए हैं—वैद्य, रोगी, औषध और परिचारक। इन चारों को चिकित्सा के कार्य को पूरा करने के साधन बताया गया है। यदि ये चारों गुणवान हों, तो कठिन से कठिन रोग को भी कम समय में ठीक किया जा सकता है।
अध्याय में स्वास्थ्य की रक्षा के लिए उचित आहार और दिनचर्या का भी महत्व बताया गया है। पाठ में कहा गया है कि भोजन करते समय बहुत अधिक पानी पीने से भोजन ठीक प्रकार से नहीं पचता और बिल्कुल पानी न पीने से भी दोष उत्पन्न हो सकता है। इसलिए पाचनाग्नि को बढ़ाने के लिए थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बार-बार पानी पीने की बात कही गई है। इसके साथ यह भी बताया गया है कि जो व्यक्ति प्रतिदिन हितकर आहार और उचित दिनचर्या का पालन करता है, सोच-समझकर कार्य करता है, इन्द्रियों के विषयों में आसक्त नहीं होता, दानशील होता है, सभी के प्रति समान भाव रखता है, सत्य बोलता है, क्षमाशील होता है और श्रेष्ठजनों की सेवा करता है, वह रोगरहित रहता है।
पाठ में वैद्य के आचरण को भी विशेष महत्व दिया गया है। वैद्य को रोगियों के प्रति मैत्री और करुणा का भाव रखना चाहिए। जिन रोगियों के रोग के ठीक होने की संभावना अधिक हो, उनके प्रति विशेष प्रीति रखकर उपचार करना चाहिए और जिन रोगियों का रोग असाध्य हो, उनके प्रति उपेक्षा का भाव रखना चाहिए। इस प्रकार पाठ में वैद्य की चतुर्विध वृत्ति—मैत्री, करुणा, प्रीति और उपेक्षण बताई गई है।
अध्याय में आत्रेय और उनके शिष्य जीवितराम की कथा भी दी गई है। आत्रेय ने अपने शिष्यों की परीक्षा लेने के लिए उन्हें ऐसी वनस्पति लाने के लिए कहा, जिसका कोई औषधीय महत्व न हो। सभी शिष्य ऐसी वनस्पतियाँ लेकर लौट आए, लेकिन उनके प्रिय शिष्य जीवितराम खाली हाथ लौटे। पूछने पर उन्होंने बताया कि उन्हें पूरे वन में ऐसी कोई वनस्पति नहीं मिली जिसमें कोई औषधीय गुण न हो। जीवितराम की बात सुनकर गुरु बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें परीक्षा में सफल घोषित किया। इस कथा का सार यह है कि प्रत्येक वनस्पति में कोई न कोई औषधीय गुण अवश्य होता है।
इस प्रकार पूरे अध्याय में स्वस्थ शरीर के महत्व, आयुर्वेद के स्वरूप, चिकित्सा के चार आधार, उचित आहार-विहार, स्वास्थ्यकर आचरण, वैद्य के कर्तव्यों और औषधीय वनस्पतियों के महत्व को बताया गया है। पाठ का मुख्य भाव यह है कि स्वास्थ्य की रक्षा के लिए उचित आहार, उचित दिनचर्या और अच्छे आचरण को अपनाना आवश्यक है तथा चिकित्सा में वैद्य, रोगी, औषध और परिचारक सभी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

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