
आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः
भारतभूमि अनेक महात्माओं, ब्रह्मर्षियों और सन्तों की जन्मभूमि रही है। उनके जीवन-चरित्र में दया, करुणा, अहिंसा, समता और बन्धुत्व जैसे जीवन-मूल्य सदा झलकते हैं। महाराष्ट्र के प्रसिद्ध सन्त नामदेव महाराज ऐसे ही एक महापुरुष थे, जिन्होंने अपने आचरण से यह सिद्ध किया कि ईश्वर केवल मन्दिर में नहीं, बल्कि सभी जीव-प्राणियों में निवास करते हैं। इस पाठ में उनके जीवन की एक ऐसी शिक्षाप्रद घटना प्रस्तुत की गई है जो हमारे जीवन को बदलने की शक्ति रखती है।
कपिल और माधवी नाम के दो भाई-बहन छुट्टियों में अपने मामा के घर गए। वहाँ खेलते समय उन्होंने एक कुत्ते को देखा और बिना किसी कारण के पत्थर उठाकर उसे मारने के लिए दौड़ पड़े। कुत्ता डर के मारे चिल्लाता हुआ भाग गया और दोनों बच्चे हँसते रहे। नानी ने यह सब दूर से देखा और उन्हें पास बुलाकर खेलना बन्द करवाया। फिर उन्होंने दोनों बच्चों को महात्मा नामदेव महाराज की एक अद्भुत कथा सुनाई।
नानी ने बताया कि नामदेव महाराज प्रतिदिन अत्यन्त श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान पाण्डुरंग के लिए नैवेद्य (भोग) की थाली लेकर मन्दिर जाते थे और पहले भगवान को भोजन कराने के बाद ही स्वयं खाते थे। उनके गुरु विसोबा ने उन्हें सिखाया था कि ईश्वर केवल मन्दिर की मूर्ति में नहीं, बल्कि सभी जीवों में वास करते हैं। एक दिन नामदेव ने थाली विग्रह के सामने रखकर आँखें बन्द करके प्रार्थना की। जब उन्होंने आँखें खोलीं तो थाली में रखी रोटी गायब थी। दरअसल एक भूखा कुत्ता आया था और रोटी मुँह में दबाकर भाग गया था।
यह सुनकर कपिल और माधवी ने सोचा कि नामदेव ने ज़रूर क्रोध में लाठी या पत्थर लेकर कुत्ते का पीछा किया होगा। लेकिन नानी ने बताया कि नामदेव ने क्रोध से नहीं, बल्कि करुणा से उस कुत्ते का पीछा किया — और वे हाथ में घी का पात्र लेकर दौड़े। उनके मन में यह विचार था कि यदि कुत्ता सूखी रोटी खाएगा तो उसके पेट में दर्द होगा, इसलिए वे कह रहे थे — “हे प्रभु! सूखी रोटी मत खाओ, घी भी ले लो।” यह सुनकर दोनों बच्चे अपराधबोध से भर गए और उनके चेहरे उदास हो गए।
नानी ने आगे बताया कि दौड़ते-दौड़ते कुत्ता अदृश्य हो गया और उसके स्थान पर स्वयं भगवान पाण्डुरंग प्रकट हुए। उन्होंने नामदेव से कहा — “वत्स नामदेव! तुमने परीक्षा पास कर ली। गुरु का यह उपदेश कि ‘ईश्वर सभी प्राणियों में निवास करते हैं’ — तुमने न केवल सुना बल्कि उसे अपने जीवन में उतारा भी। तुम धन्य हो।” यह कथा सुनकर कपिल ने स्वीकार किया कि उसने भी बिना कारण कुत्ते को मारा और पहले भी कई बार जीवों को पीड़ा दी। माधवी ने भी क्षमा माँगी। नानी ने दोनों को गले लगाया और कहा कि हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम शरीर, वाणी और मन से किसी को भी कष्ट नहीं देंगे और दूसरों की पीड़ा दूर करने का प्रयास करेंगे। पाठ का मूल संदेश यही है — “आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः” अर्थात् जो सभी प्राणियों को अपने समान समझता है, वही सच्चा ज्ञानी है।

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