न खलु वयस्तेजसो हेतुः
भारत की आजादी के अमृत महोत्सव के समय हमें याद आता है कि स्वतंत्रता के लिए कितने ज्ञात-अज्ञात क्रांतिवीरों ने अपना परिवार और अपना जीवन देश पर न्योछावर कर दिया। ऐसे ही एक तेजस्वी बाल क्रांतिवीर थे खुदीराम बोस।
खुदीराम का जन्म 1889 में बंगाल के मेदिनीपुर जिले के मोहोबनी गांव में हुआ था। बचपन में ही उनके माता-पिता का देहांत हो गया, इसलिए उनकी बड़ी बहन अपरूपा देवी ने उनका पालन-पोषण किया। खुदीराम साधारण बच्चों की तरह खेल-कूद में नहीं लगते थे। वे अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर हो रहे अत्याचार देखकर बहुत दुखी होते थे।
1905 में जब लॉर्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन किया, तो पूरे देश में बंग-भंग आंदोलन छिड़ गया। उस समय खुदीराम सिर्फ 15-16 साल के थे, लेकिन देशभक्ति की भावना से भरकर वे आंदोलन में कूद पड़े। वे बच्चों का संघटन करते, पदयात्राएं निकालते, “वंदे मातरम्” जैसे देशभक्ति के गीत गाते और लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए पर्चे बांटते थे।
वे गुप्त क्रांतिकारी संगठनों से जुड़े। सत्येंद्रनाथ बोस जैसे क्रांतिवीरों से प्रशिक्षण लिया और प्रफुल्ल चाकी के साथ मिलकर अंग्रेजी अधिकारी किंग्सफोर्ड को मारने की योजना बनाई। किंग्सफोर्ड बहुत क्रूर था और क्रांतिकारियों को सख्त सजा देता था।
28 अप्रैल 1908 को खुदीराम और प्रफुल्ल ने किंग्सफोर्ड की गाड़ी पर बम फेंका। लेकिन दुर्भाग्य से उस गाड़ी में किंग्सफोर्ड नहीं, बल्कि एक अंग्रेज अधिकारी की पत्नी और बेटी थीं, जो मारी गईं। दोनों क्रांतिवीर भागे, लेकिन पकड़े गए। प्रफुल्ल चाकी ने पुलिस के हाथों पकड़े जाने से पहले खुद को गोली मार ली और वंदे मातरम् बोलते हुए शहीद हो गए।
खुदीराम को गिरफ्तार कर लिया गया। अदालत में हर सवाल का जवाब उन्होंने सिर्फ “वंदे मातरम्” देकर दिया। अंग्रेज न्यायाधीश ने 18-19 साल के इस बालक को फांसी की सजा सुना दी। खुदीराम के चेहरे पर डर या दुख नहीं, बल्कि प्रसन्नता, शांति और तेज था। 11 अगस्त 1908 को मात्र 18-19 वर्ष की उम्र में उन्होंने हंसते हुए और “वंदे मातरम्” जपते हुए फांसी चढ़कर देश के लिए बलिदान दे दिया।
संदेश: इस पाठ का मुख्य संदेश है कि उम्र तेज (साहस और देशभक्ति) का कारण नहीं होती। खुदीराम जैसे नौजवान भी देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर सकते हैं। सच्ची देशभक्ति उम्र नहीं देखती, बल्कि हृदय की लगन देखती है।


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