पञ्च शीलानि आचरेम, आदर्शसमाजं रचयेम
(हम पाँच अच्छे नियमों का पालन करें और एक अच्छा समाज बनाएँ।)
इस पाठ में भगवान गौतम बुद्ध के जीवन, उनकी करुणा और उनके उपदेशों का वर्णन किया गया है। शिक्षिका बच्चों को बताती हैं कि सांची स्तूप बौद्ध धर्म का प्रसिद्ध स्मारक है, जिसका निर्माण सम्राट अशोक ने कराया था। गौतम बुद्ध के उपदेश आज भी पूरे विश्व के लिए उपयोगी और प्रासंगिक हैं।
शिक्षिका व्याघ्री जातक की कथा सुनाती हैं। बोधिसत्त्व ने एक अत्यंत भूखी और कमजोर बाघिन को देखा, जो भूख के कारण अपने बच्चों को भी मारने के लिए तैयार थी। बोधिसत्त्व ने उस बाघिन और उसके बच्चों की रक्षा के लिए अपने शरीर का त्याग कर दिया। यह कथा भगवान बुद्ध की असीम दया, करुणा और परोपकार की भावना को प्रकट करती है।
भगवान बुद्ध ने लोगों के दुःख दूर करने के लिए चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग का उपदेश दिया। साथ ही गृहस्थों के नैतिक जीवन के लिए पाँच शील बताए—किसी जीव की हत्या न करना, चोरी न करना, व्यभिचार से दूर रहना, झूठ न बोलना तथा मद्य और नशीले पदार्थों का सेवन न करना।
पाठ का मुख्य संदेश है कि यदि हम अहिंसा, सत्य, करुणा, मैत्री और नैतिकता को अपने जीवन में अपनाएँ और पंचशीलों का पालन करें, तो समाज में शांति और सद्भाव स्थापित होगा तथा एक आदर्श समाज का निर्माण होगा।

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