समथेन कृषिः कार्या लोकानां हितकाम्यया
(लोगों के हित के लिए खेती करनी चाहिए।)
इस पाठ में कृषि के महत्त्व, किसान के परिश्रम और प्राचीन भारतीय कृषि-विज्ञान के बारे में बताया गया है।
भारत प्राचीन समय से ही कृषि-प्रधान देश रहा है। कृषि के द्वारा अन्न, फल, सब्जियाँ, वनस्पतियाँ और अन्य आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त होती हैं। इसलिए मनुष्य के जीवन में कृषि का बहुत बड़ा महत्त्व है। पाठ में कहा गया है कि अन्न ही प्राण, बल और जीवन की सभी आवश्यकताओं को पूरा करने का साधन है। देवता, मनुष्य और अन्य सभी जीव किसी न किसी रूप में अन्न पर निर्भर हैं।
कृषि के लिए किसान बहुत मेहनत करता है। वह सबसे पहले भूमि और जल की जाँच करता है। उपयुक्त भूमि का चुनाव करके उसे तैयार करता है और फिर बीज बोने आदि का कार्य करता है। इस प्रकार कृषि केवल मेहनत का ही नहीं, बल्कि ज्ञान और विज्ञान का भी कार्य है।
पाठ में प्राचीन भारतीय ग्रंथों और विद्वानों का भी उल्लेख है। कौटिल्य ने कृषि-विज्ञान को ‘वार्ता’ विद्या के अंतर्गत रखा था। इसके अतिरिक्त काश्यपीयकृषिपद्धति, कृषिपाराशर और वृक्षायुर्वेद जैसे ग्रंथों में कृषि से संबंधित ज्ञान का वर्णन मिलता है।
🌾 अन्न के चार प्रकार
पाठ के अनुसार अन्न को मुख्य रूप से चार रूपों में बताया गया है—
- व्रीह्यादि रूप — धान्य या अनाज से प्राप्त अन्न
- मुद्ग-माषादि रूप — दालों/द्विदल अनाज से प्राप्त अन्न
- शाकादि रूप — विभिन्न सब्जियों से प्राप्त अन्न
- लताकुसुमादि रूप — फल और फूल आदि से प्राप्त अन्न
👨🌾 किसान के गुण
पाठ में किसान को परिश्रमी और सद्गुणों से युक्त बताया गया है। कृषि में लगे व्यक्ति सत्य बोलने वाले, परोपकारी, प्रसन्नचित्त, आलस्य से दूर, काम और क्रोध से रहित तथा एक-दूसरे की सहायता करने वाले होते हैं।
🔬 भूमि की जाँच
प्राचीन कृषि-विज्ञान में भूमि की उपयुक्तता जाँचने के कुछ तरीके भी बताए गए हैं। मिट्टी को सूँघकर, चखकर, तौलकर तथा मिट्टी को पात्र में रखे पानी में डालकर कुछ समय बाद पानी का निरीक्षण करके भूमि की गुणवत्ता का पता लगाया जाता था।
⭐ मुख्य संदेश
कृषि मानव जीवन का आधार है। अन्न के बिना जीवन संभव नहीं है। इसलिए योग्य और समर्थ व्यक्ति को लोक-कल्याण की भावना से कृषि करनी चाहिए तथा किसानों के परिश्रम और कृषि के महत्त्व का सम्मान करना चाहिए।

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