“धर्मश्च व्यवहारश्च चरित्रं राजशासनम्” –
धर्म, अच्छा व्यवहार, अच्छा चरित्र और राजा की आज्ञा का पालन करना चाहिए
इस अध्याय में आचार्य कौटिल्य द्वारा रचित ‘अर्थशास्त्र’ के आधार पर धर्म, न्याय, शासन-व्यवस्था, राजा के कर्तव्य और राज्य के विभिन्न अंगों के बारे में बताया गया है। अध्यापक और विद्यार्थियों के बीच संवाद के माध्यम से पाठ की विषय-वस्तु समझाई गई है। विद्यार्थी पुस्तकालय में ‘अर्थशास्त्र’ ग्रंथ को देखकर उसके विषय में जानना चाहते हैं। अध्यापक बताते हैं कि कौटिल्य के अर्थशास्त्र में आचार, व्यवहार, नागरिकों के कर्तव्य तथा शासन-व्यवस्था जैसे अनेक विषयों का विस्तार से वर्णन किया गया है।
पाठ में राज्य के सात प्रमुख अंगों का वर्णन किया गया है—स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोश, दण्ड और मित्र। स्वामी का अर्थ राजा या शासन-प्रमुख, अमात्य का अर्थ मंत्री, जनपद का अर्थ लोगों के निवास योग्य भूमि, दुर्ग का अर्थ सुरक्षित स्थान, कोश का अर्थ सरकारी धन का भंडार, दण्ड का अर्थ शासन तथा सेना और मित्र का अर्थ सहयोगी राज्य या मित्र होता है। इन सातों अंगों को राज्य का आधार माना गया है और इनके उचित संचालन से राष्ट्र समृद्ध होता है।
अध्याय में न्याय-व्यवस्था के चार आधार भी बताए गए हैं—धर्म, व्यवहार, चरित्र और राजशासन। धर्म सत्य पर आधारित है और उसके अनुसार न्याय किया जाना चाहिए। व्यवहार का अर्थ विवाद या संदेह की स्थिति में साक्षियों आदि के आधार पर समाधान करना है। चरित्र का अर्थ सज्जनों द्वारा अपनाया गया उचित आचरण है, जबकि राजशासन का अर्थ राजा द्वारा दिया गया निर्णय या आदेश है। इन चारों के माध्यम से विवादों का समाधान किया जाता था।
पाठ में आदर्श राजा के कर्तव्यों पर भी विशेष जोर दिया गया है। राजा को विद्या से विनीत, योग्य और प्रजा के हित में हमेशा तत्पर रहना चाहिए। राजा का जीवन व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं बल्कि प्रजा की सेवा और कल्याण के लिए समर्पित होना चाहिए। राजा को अपने सुख की अपेक्षा प्रजा के सुख और हित को अधिक महत्त्व देना चाहिए। अर्थात् एक अच्छे शासक की सबसे बड़ी जिम्मेदारी अपनी प्रजा की सुरक्षा, सुख और उन्नति सुनिश्चित करना है।
इसके बाद राजकोष और कर-व्यवस्था के महत्त्व को समझाया गया है। राज्य के सभी कार्यों के लिए कोश अर्थात् सरकारी धन आवश्यक है। प्राचीन समय में भी कर-व्यवस्था मौजूद थी। पाठ के अनुसार धान्य का छठा भाग, व्यापार से प्राप्त आय का दसवाँ भाग तथा सोना आदि कर के रूप में दिए जाने का नियम था। इससे पता चलता है कि प्राचीन भारत में शासन और अर्थव्यवस्था को व्यवस्थित रूप से चलाने के लिए आर्थिक व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जाता था।
अध्याय में आधुनिक भारत से जुड़े कुछ प्रसिद्ध ध्येय-वाक्यों का भी उल्लेख किया गया है, जैसे “यतो धर्मस्ततो जयः” अर्थात् जहाँ धर्म है, वहीं विजय है और “सत्यमेव जयते” अर्थात् सत्य की ही विजय होती है। इससे यह संदेश मिलता है कि भारतीय शासन और न्याय की परंपरा में धर्म और सत्य को विशेष स्थान दिया गया है।
अंत में पाठ धन, धर्म, ज्ञान और सुख के संबंध को समझाता है। मनुष्य धन, पद और साधन सुख प्राप्त करने के लिए अर्जित करता है, लेकिन केवल धन से वास्तविक सुख प्राप्त नहीं होता। धर्म के अनुसार प्राप्त किया गया धन ही सुख का कारण बनता है। ज्ञान से विनय, विनय से पात्रता, पात्रता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख प्राप्त होता है। इसलिए मनुष्य को केवल धन प्राप्त करने के बजाय ज्ञान, विनय, धर्म और अच्छे आचरण को भी अपने जीवन में अपनाना चाहिए।
मुख्य संदेश: यह अध्याय हमें सिखाता है कि एक आदर्श राज्य के लिए मजबूत शासन, न्याय, धर्म, सत्य, योग्य राजा, उचित आर्थिक व्यवस्था और प्रजा का कल्याण आवश्यक हैं। साथ ही व्यक्ति के जीवन में ज्ञान, विनय और धर्म का पालन ही वास्तविक सुख और सफलता का मार्ग है।

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