यक्ष-युधिष्ठिरसंवादः (यक्ष और युधिष्ठिर के बीच हुआ संवाद)
इस अध्याय में महाभारत के वनपर्व से यक्ष और युधिष्ठिर के प्रसिद्ध संवाद का वर्णन किया गया है। अज्ञातवास के समय पाण्डव वन में रहते हुए बहुत प्यासे हो गए। युधिष्ठिर ने पहले नकुल को जल लाने भेजा। नकुल को एक सुंदर सरोवर मिला, लेकिन जल पीने से पहले एक यक्ष ने उसे अपने प्रश्नों के उत्तर देने की चेतावनी दी। नकुल ने उसकी बात नहीं मानी और जल पीने के बाद मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। इसके बाद सहदेव, अर्जुन और भीम भी जल लेने गए और यक्ष की चेतावनी की उपेक्षा करने के कारण मूर्च्छित हो गए। अंत में युधिष्ठिर स्वयं सरोवर के पास पहुँचे। यक्ष ने उन्हें भी पहले अपने प्रश्नों के उत्तर देने को कहा। युधिष्ठिर ने धैर्य और बुद्धिमानी से सभी प्रश्नों के उचित उत्तर दिए। यक्ष ने पूछा कि प्रवास में व्यक्ति का मित्र कौन है, घर में कौन मित्र है, रोगी का मित्र कौन है और मरने वाले का मित्र कौन है। युधिष्ठिर ने उत्तर दिया कि प्रवासी का मित्र विद्या, गृहस्थ का मित्र पत्नी, रोगी का मित्र वैद्य और मरने वाले का मित्र दान है।
यक्ष ने तप, दम, क्षमा और लज्जा के विषय में भी प्रश्न किए। युधिष्ठिर ने बताया कि अपने कर्तव्य पर टिके रहना तप है, मन और इन्द्रियों का नियंत्रण दम है, सुख-दुःख आदि को सहन करना क्षमा है और गलत कार्यों से दूर रहना लज्जा है। उन्होंने यह भी बताया कि ज्ञान का अर्थ वास्तविक सत्य को समझना, शम का अर्थ मन की शांति, दया का अर्थ सभी के सुख की इच्छा और सरलता का अर्थ सभी के प्रति समान भाव रखना है।
आगे युधिष्ठिर बताते हैं कि मनुष्य का सबसे कठिन शत्रु क्रोध है, सबसे नष्ट न होने वाला रोग लोभ है, सभी प्राणियों का हित चाहने वाला व्यक्ति सज्जन है और निर्दयी व्यक्ति दुर्जन है। धर्म को जानने वाला पंडित है, मूर्ख व्यक्ति धर्म को नहीं समझता, काम संसार के बंधन का कारण है और मत्सर अर्थात् ईर्ष्या हृदय का दुःख है।
इसके बाद यक्ष चार महत्वपूर्ण प्रश्न पूछता है—सुखी कौन है, संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है, सही मार्ग कौन-सा है और संसार में सबसे बड़ी वार्ता क्या है। युधिष्ठिर उत्तर देते हैं कि जो व्यक्ति अपने घर में साधारण भोजन करता है, ऋण से मुक्त है और विदेश में नहीं रहता, वही सुखी है। सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि मनुष्य प्रतिदिन दूसरों को मृत्यु की ओर जाते हुए देखता है, फिर भी स्वयं हमेशा जीवित रहने की इच्छा करता है। सही मार्ग वह है जिस पर महान और धर्मात्मा लोग चले हैं। संसार की सबसे बड़ी वार्ता यह है कि समय सब प्राणियों को जन्म और मृत्यु के चक्र में डालता रहता है।
युधिष्ठिर के विवेकपूर्ण और संतोषजनक उत्तरों से प्रसन्न होकर यक्ष ने उनके भाइयों को जीवित करने का वरदान दिया। इस प्रकार यह अध्याय हमें धैर्य, बुद्धि, आत्मसंयम, धर्म, दया, सत्य, संतोष और अच्छे आचरण का महत्त्व समझाता है। पाठ का मुख्य संदेश है कि कठिन परिस्थितियों में भी मनुष्य को घबराए बिना विवेक और धर्म का पालन करना चाहिए।

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