यादृशम् अनन् तादृशं मनः (जैसा अन्न होता है, वैसा ही मन होता है।)
इस पाठ में ऋषि आरुणि और उनके पुत्र श्वेतकेतु के संवाद के माध्यम से भोजन, मन, प्राण और वाणी के संबंध को समझाया गया है। आरुणि बताते हैं कि भोजन का सूक्ष्म भाग मन, जल का सूक्ष्म भाग प्राण और तेज का सूक्ष्म भाग वाणी बनता है। वे दही से घी बनने का उदाहरण देकर समझाते हैं कि जैसे दही का सबसे सूक्ष्म भाग घी बनता है, वैसे ही भोजन का सूक्ष्म सार मन बनता है। पाठ का मुख्य संदेश है कि “जैसा अन्न, वैसा मन”, अर्थात् हम जैसा भोजन ग्रहण करते हैं, उसका प्रभाव हमारे विचारों और मन पर पड़ता है। इसलिए स्वस्थ शरीर, शुद्ध मन, अच्छी एकाग्रता और अच्छे जीवन के लिए शुद्ध, पौष्टिक, संतुलित और सात्त्विक भोजन करना आवश्यक है।


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