परिचय
पिछले अध्याय में हमने सीखा कि राज्य विधानमंडल क्या होता है और विधायक कैसे चुने जाते हैं।इस अध्याय में हम राज्य की कार्यपालिका (Executive) के बारे में जानेंगे, जिसमें दो प्रमुख अंग होते हैं –
- राज्यपाल
- राज्य मंत्रि-परिषद् (मुख्यमंत्री सहित)
राज्यपाल
राज्यपाल का पद
- राज्यपाल राज्य का प्रमुख (मुखिया) होता है।
- राज्य का सारा शासन राज्यपाल के नाम से चलाया जाता है।
- राज्य सरकार के सभी कार्य राज्यपाल के नाम से ही किए जाते हैं।
राज्यपाल की नियुक्ति
- राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
- राष्ट्रपति यह नियुक्ति केंद्र की मंत्रिपरिषद् की सिफारिश पर करते हैं।
- राज्यपाल का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है।
- राष्ट्रपति चाहे तो कार्यकाल पूरा होने से पहले भी राज्यपाल को पद से हटा सकते हैं।
- राज्यपाल स्वयं भी राष्ट्रपति को त्यागपत्र देकर पद छोड़ सकते हैं।
- राज्यपाल की अनुपस्थिति में राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश राज्यपाल का कार्यभार संभालते हैं।
- राष्ट्रपति कार्यवाहक राज्यपाल भी नियुक्त कर सकते हैं।
राज्यपाल पद के लिए अर्हताएँ
राज्यपाल बनने के लिए निम्नलिखित योग्यताएँ आवश्यक हैं –
- भारत का नागरिक हो।
- आयु 35 वर्ष या उससे अधिक हो।
- संसद या राज्य विधानमंडल का सदस्य न हो।
- केंद्र या राज्य सरकार के अधीन किसी लाभकारी पद पर कार्यरत न हो।
राज्यपाल द्वारा शपथ ग्रहण
- राज्यपाल पद ग्रहण करने से पहले अपने राज्य के उच्च न्यायालय के न्यायाधीश (या वरिष्ठतम न्यायाधीश) के समक्षअपने पद और संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेते हैं।
राज्यपाल की शक्तियाँ और कार्य
राज्यपाल की शक्तियाँ अधिकांशतः राष्ट्रपति जैसी ही होती हैं।
1. नियुक्ति संबंधी शक्तियाँ
- राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करते हैं।
- मुख्यमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रियों, राज्य महाअधिवक्ता, राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्य,मानव अधिकार आयोग, मुख्य सचिव, लोकायुक्त आदि की नियुक्ति करते हैं।
2. विधानमंडल संबंधी शक्तियाँ
- राज्यपाल राज्य विधानमंडल की बैठक बुलाने या स्थगित करने का कार्य करते हैं।
- विधानसभा में पारित विधेयक राज्यपाल के हस्ताक्षर के बाद ही कानून (अधिनियम) बनता है।
- यदि विधानसभा की बैठक नहीं चल रही हो और कानून की तुरंत आवश्यकता हो, तोराज्यपाल अध्यादेश जारी कर सकते हैं – जो कानून के समान ही माना जाता है।
3. विशेष शक्तियाँ
- यदि राज्यपाल को लगे कि राज्य का शासन संविधान के अनुसार नहीं चल रहा,या सरकार अस्थिर है (जैसे दलबदल के कारण),तो वे राष्ट्रपति को राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर सकते हैं।
राज्य मंत्रि-परिषद्
1. गठन
- राज्यपाल की सहायता और परामर्श के लिए एक मंत्रि-परिषद् का गठन किया जाता है।
- इसका प्रमुख मुख्यमंत्री होता है।
2. मुख्यमंत्री की नियुक्ति
- जिस दल को विधानसभा चुनावों में बहुमत (आधे से अधिक सीटें) प्राप्त होती हैं,उस दल के नेता को राज्यपाल मुख्यमंत्री नियुक्त करते हैं।
- कभी-कभी दो या अधिक दल मिलकर गठबंधन सरकार बनाते हैं,लेकिन उन्हें विधानसभा में बहुमत साबित करना होता है।
- मुख्यमंत्री की सलाह से ही अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं।
- राज्यपाल, मुख्यमंत्री के परामर्श से विभागों का बँटवारा करते हैं।
3. मंत्रि-परिषद् की चार श्रेणियाँ
- कैबिनेट मंत्री (मुख्य मंत्री स्तर के मंत्री)
- राज्यमंत्री
- उपमंत्री
- संसदीय सचिव
किसी भी मंत्री के लिए राज्य विधानमंडल का सदस्य होना आवश्यक है।यदि नियुक्ति के समय सदस्य न हो, तो 6 माह के भीतर किसी सदन की सदस्यता प्राप्त करनी होती है।
राज्य मंत्रि-परिषद् के कार्य व शक्तियाँ
राज्य मंत्रि-परिषद् ही राज्य की वास्तविक कार्यपालिका होती है।इसके मुख्य कार्य और शक्तियाँ निम्नलिखित हैं 👇
1. नीति निर्धारण एवं क्रियान्वयन
- राज्य के विकास और संचालन के लिए नीतियाँ बनाना।
- उन नीतियों को लागू करने के आदेश जारी करना।
- प्रशासनिक स्तर पर इन कार्यों की निगरानी करना।
2. राज्यपाल को परामर्श देना
- राज्य के उच्च पदों पर नियुक्ति के लिए राज्यपाल को सलाह देना।
3. विधायी कार्य
- सरकार द्वारा पेश किए जाने वाले विधेयक (Bills) मंत्रि-परिषद् तैयार करती है।
- विधानसभा में इन पर चर्चा, उत्तर देना और पारित करवाना मंत्रियों की जिम्मेदारी होती है।
- यदि कोई सरकारी विधेयक अस्वीकृत हो जाता है,तो पूरी मंत्रि-परिषद् को त्यागपत्र देना पड़ता है।
4. वित्तीय कार्य
- राज्य की नीतियों को लागू करने के लिए आय-व्यय का बजट (वित्त विधेयक) तैयार करती है।
- इसे वित्त मंत्री विधानसभा में प्रस्तुत करते हैं और स्वीकृति प्राप्त करते हैं।

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