उद्देश्य
- समय का महत्व, त्याग, सेवा भावना, परिश्रम, लगन, और ईमानदारी जैसे गुणों का विकास करना।
- योजक चिह्न का प्रयोग समझना।
परिचय
- विश्व में कई महापुरुष हुए हैं, जिनके आचरण और क्रियाशीलता ने लोगों का मार्गदर्शन किया।
- उनके जीवन से प्रेरणा लेकर कई लोगों ने अपने जीवन को सफल बनाया।
- प्रतिकूल परिस्थितियों में भी वे मेहनत और लगन से शीर्ष पर पहुँचे और दूसरों के लिए प्रेरक प्रसंग छोड़े।
1. महावीर प्रसाद द्विवेदी
ज्ञान और प्रयत्न साधना
- महावीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म गरीबी में हुआ और उनका पालन-पोषण अभावों में हुआ।
- शिक्षा के प्रति उनकी लिप्सा (लालसा) बहुत गहरी थी।
- केवल 13 वर्ष की उम्र में वे 26 मील दूर रायबरेली के जिला स्कूल में अंग्रेजी पढ़ने गए।
- जरूरी सामान पीठ पर लादकर ले जाते थे।
- उन्होंने हिंदी, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, और फारसी का ज्ञान प्राप्त किया।
- उनकी स्कूली शिक्षा फतेहपुर और उन्नाव में पूरी हुई।
- स्कूल के बाद वे जी. आर. पी. रेलवे में तार बाबू बने और अपनी मेहनत से पदोन्नति प्राप्त की।
- बाद में उन्होंने रेलवे की नौकरी छोड़कर ‘सरस्वती’ पत्रिका का संपादन शुरू किया।
- उनका उद्देश्य केवल साहित्य साधना ही नहीं, बल्कि समाज की सेवा करना भी था।
समय साधना
- समय का महत्व: समय की साधना व्यक्तित्व को निखारती है।
- एक बार मैथिलीशरण गुप्त द्विवेदीजी से मिलने गए। उन्होंने देखा कि दरवाजे पर एक तख्ती थी, जिस पर लिखा था, “प्रातः काल भेंट न हो सकेगी”।
- गुप्तजी ने शाम को मिलने का समय लिया। द्विवेदीजी ने बताया कि सुबह वे ‘सरस्वती’ पत्रिका के संपादन का काम करते हैं, क्योंकि सुबह का समय मानसिक कार्यों के लिए सबसे अच्छा होता है।
- एक अन्य घटना में सद्गुरूशरण अवस्थी अपने मित्र के साथ द्विवेदीजी से मिलने गए। द्विवेदीजी ने पहले ही बता दिया कि उनकी बात 15 मिनट में पूरी होनी चाहिए।
- उन्होंने नपे-तुले शब्दों में बात की और समय पूरा होने पर पूछा, “कोई विशेष बात तो नहीं रह गई?”
- द्विवेदीजी ने कहा कि पूर्व निर्धारित समय में काम करने से कार्य व्यवस्थित रहता है और एक कार्य दूसरे के समय में नहीं घुसता।
सेवा साधना
- द्विवेदीजी का जीवन साहित्य शिल्पी और संत स्वभाव का था।
- एक बार उन्होंने पुरूलिया कुष्ठ आश्रम के बारे में एक लेख पढ़ा और उसका जवाब संपादक को लिखा। उन्होंने अपनी पेंशन के 7 रुपये में से 5 रुपये आश्रम को भेज दिए और मन में बेचैनी थी कि सारे 7 रुपये क्यों नहीं भेजे।
- एक बार रास्ते में एक किसान को नया अन्न खाने से बीमार देखकर वे घर लौटे, दवा लाए, और उसकी मदद की।
- बनारसीदास जी के पूछने पर उन्होंने कहा कि सेवा और साहित्य रचना जीवन के दो पहलू हैं, जैसे एक सिक्के के दो पहलू।
2. अब्राहम लिंकन
प्रेरक प्रसंग
- अब्राहम लिंकन एक गरीब लड़का था, जो लट्ठों से बने घर में रहता था।
- वह अपने अमीर साथियों को स्कूल जाते देख सोचता था कि उनके पास सुख के साधन हैं, लेकिन वह खुद मेहनत करके पढ़ेगा।
- उसने फैसला किया कि वह कमाएगा और पढ़ेगा।
- दिनभर वह खेतों में गल्ला (अनाज) उठाने का काम करता और रात को दिया जलाकर पढ़ता।
- पढ़ने की लगन इतनी थी कि वह आधी रात तक पढ़ता, फिर भी थकता नहीं।
- किताबें न होने पर वह दूसरों से माँगकर पढ़ता।
- एक बार माँगी हुई किताब पढ़ते-पढ़ते वह सो गया। कोहरे से किताब भीग गई।
- किताब का मालिक नई किताब या दाम माँगने लगा। लिंकन के पास पैसे नहीं थे, इसलिए उसने चार दिन खेत में काम करके किताब का हरजाना (जुर्माना) चुकाया।
- किताब अब उसकी हो गई, जिससे वह खुश था।
- वह गणित के सवाल लकड़ी के लट्ठों पर जले हुए कोयले से हल करता था। लट्ठे उसकी कॉपी और डेस्क थे।
- गरीबी ने उसे पढ़ने की प्रेरणा दी, और वह ईमानदारी से केवल जरूरत भर कमाता था।
- वकील बनकर उसने गरीबों की मदद की।
- अपनी लगन, ईमानदारी, परिश्रम, और योग्यता के बल पर वह अमेरिका का प्रेसिडेंट बना।
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