पाठ का सारांश
रहीम के दोहे हमें नीति और लोक व्यवहार का ज्ञान देते हैं। इन दोहों में सरल और सुंदर शब्दों के माध्यम से जीवन के महत्वपूर्ण मूल्यों जैसे अच्छा आचरण, समय का महत्व, सच्ची मित्रता, और उचित शब्दों का उपयोग सिखाया गया है। ये दोहे हमें सही रास्ते पर चलने की प्रेरणा देते हैं।
दोहों का अर्थ और व्याख्या
दोहा 1 जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय। बारे उजियारो करै, बढ़े अँधेरो होय।
अर्थ: रहीम कहते हैं कि जैसे दीपक जलकर प्रकाश देता है, वैसे ही कपूत (बुरा पुत्र) अपने कुल को नष्ट कर देता है। वह अपने बुरे व्यवहार से परिवार की इज्जत को अंधेरे में डुबो देता है।
सीख: हमें अपने व्यवहार से परिवार की मर्यादा को बनाए रखना चाहिए।
दोहा 2 अमृत ऐसे वचन में, रहिमन रिस की गाँस। जैसे मिसिरिहु में मिली, निरस बाँस की फाँस।
अर्थ: रहीम कहते हैं कि मीठे शब्दों में अगर क्रोध की चुभन (रिस की गाँस) मिल जाए, तो वह मिश्री में बाँस की फाँस की तरह दुख देती है।
सीख: हमें हमेशा मीठे और सौम्य शब्द बोलने चाहिए, क्रोध भरे शब्द दूसरों को चोट पहुँचाते हैं।
दोहा 3 रहिमन अब वे बिरछ कहँ जिनकी छाँह गंभीर। बागन बिच-बिच देखियत, सेंहुड कुंज करीर।
अर्थ: रहीम कहते हैं कि अब वे बड़े और छायादार वृक्ष नहीं दिखते जो गहरी छाँव देते थे। बगीचों में अब केवल थूहर और करील जैसी काँटेदार झाड़ियाँ दिखती हैं।
सीख: अच्छे और गुणवान लोगों की कमी हो रही है, हमें अच्छे गुण अपनाने चाहिए।
दोहा 4 रहिमन जिहवा बावरी, कहि गई सरग पताल। आपु तो कहि भीतर गई, जूती खात कपाल।
अर्थ: रहीम कहते हैं कि जीभ का बावलापन (अनुचित बोलना) स्वर्ग और पाताल तक की बातें कह देता है। इससे बोलने वाला खुद को नुकसान पहुँचाता है, जैसे जूता सिर पर मार खाता है।
सीख: हमें सोच-समझकर बोलना चाहिए, गलत शब्दों से नुकसान होता है।
दोहा 5 तन रहीम है कर्म बस, मन राखो ओहि ओर। जल में उलटी नाव ज्यों, खैंचत गुन के जोर।
अर्थ: रहीम कहते हैं कि शरीर कर्मों के अधीन है, लेकिन मन को सही दिशा में रखना चाहिए। यह उलटी नाव की तरह है, जिसे खींचने में बहुत मेहनत लगती है
सीख: मन को नियंत्रित करना जरूरी है, वरना वह गलत रास्ते पर ले जा सकता है।
दोहा 6 समय लाभ सम लाभ नहिं, समय चूक सम चूक। चतुरन चित रहिमन लगी, समय चूक की हूक।
अर्थ: रहीम कहते हैं कि सही समय पर काम करने से लाभ होता है, लेकिन समय चूकने पर नुकसान होता है। समय चूकने का दुख बहुत कष्टकारी होता हैं।
सीख: समय का सही उपयोग करना चाहिए, वरना पछतावा होता है।
दोहा 7 कहि रहीम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीति। विपति कसौटी जे कसे, ते ही साँचे मीत।
अर्थ: रहीम कहते हैं कि संपत्ति के समय तो कई लोग सगे-संबंधी बन जाते हैं, लेकिन सच्चा मित्र वही है जो मुसीबत में साथ दे।
सीख: सच्चा मित्र वही है जो विपत्ति में साथ देता है।
दोहा 8 दीन सबन को लखत है, दीनहि लखै न कोय। जो रहीम दीनहि लखै, दीनबंधु सम होय।
अर्थ: रहीम कहते हैं कि हर कोई दीन (गरीब) को देखता है, लेकिन कोई उसकी मदद नहीं करता। जो दीन की मदद करता है, वह दीनबंधु (दुखियों का साथी) के समान है।
सीख: हमें जरूरतमंदों की मदद करनी चाहिए।
दोहा 9 पावस देखि रहीम मन, कोइल साधे मौन। आब दादुर वक्ता भए, हमको पूछत कौन।
अर्थ: रहीम कहते हैं कि बारिश के समय कोयल चुप हो जाती है और मेंढक बोलने लगते हैं। इससे कोई हमारी बात नहीं सुनता।
सीख: समय के अनुसार चुप रहना या बोलना सीखना चाहिए।
दोहा 10 बिपति भए धन ना रहे, रहे जो लाख करोर। नभ तारे छिपि जात हैं, ज्यों रहीम भए भोर।
अर्थ: रहीम कहते हैं कि विपत्ति में धन नहीं टिकता, चाहे वह लाखों-करोड़ों में हो। जैसे सुबह होने पर तारे छिप जाते हैं, वैसे ही मुसीबत में धन गायब हो जाता है।
सीख: धन से ज्यादा सच्चे मित्र और अच्छे गुण महत्वपूर्ण हैं।
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