1.1 पर्यावरण की भारतीय अवधारणा
- प्राचीन काल से मानव और प्रकृति का घनिष्ठ संबंध रहा है।
- वेदों में प्रकृति को माता के रूप में बताया गया है।
- मानव ने सदैव प्रकृति की पूजा की –
- गंगा, यमुना, सरस्वती जैसे नदियों की,
- पीपल, नीम, तुलसी जैसे वृक्षों की,
- सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी को नमन किया है।
- उपनिषदों में पृथ्वी को परमात्मा का शरीर कहा गया है।
- सभी धर्मों में प्रकृति के संरक्षण का संदेश है –
- हिन्दू धर्म – अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी की पूजा।
- इस्लाम धर्म – जीव हत्या का निषेध व पेड़ों की रक्षा।
- बौद्ध धर्म – भगवान बुद्ध को वटवृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ।
- जैन धर्म – जीव हिंसा का निषेध, प्रकृति में विहार आवश्यक।
- निष्कर्षतः – मानव और प्रकृति परस्पर सर्जक, पोषक और रक्षक हैं।
1.2 प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक पर्यावरण
- पर्यावरण का अर्थ है – “वह सब जो हमें चारों ओर से घेरे हुए है और प्रभावित करता है।”
- यह दो प्रकार का होता है –
- प्राकृतिक (भौतिक) पर्यावरण – जैसे पर्वत, नदी, जंगल, जलवायु, पशु-पक्षी।
- सांस्कृतिक (सामाजिक) पर्यावरण – जैसे गाँव, शहर, सड़कें, रीतियाँ, त्यौहार, संस्कृति आदि।
प्राकृतिक पर्यावरण के तत्व:
- स्थिति, धरातल, जलवायु, वनस्पति, मिट्टी, जल, जीव-जंतु, खनिज संपदा।
सांस्कृतिक पर्यावरण के तत्व:
- भोजन, वस्त्र, आवास, व्यवसाय, धर्म, परिवहन, राजनीति, कला-कौशल आदि।
मुख्य बातें:
- पर्यावरण परिवर्तनशील है।
- इसमें क्षेत्रीय विविधता होती है।
- भौतिक पर्यावरण प्राकृतिक आवास है।
- मानव और प्रकृति के पारस्परिक संबंध से ही सांस्कृतिक-सामाजिक पर्यावरण बनता है।
1.3 प्राकृतिक पर्यावरण के संसाधन
संसाधन की परिभाषा:
कोई भी पदार्थ जब मानव के लिए उपयोगी बन जाए, तो वह संसाधन कहलाता है।
संसाधन के प्रकार:
- प्राकृतिक संसाधन
- जैसे जल, वायु, मिट्टी, खनिज, वन, वन्य जीव आदि।
- ये दो प्रकार के होते हैं –
- नवीकरणीय (Renewable): जैसे वन, कृषि भूमि, जल।
- अनवीकरणीय (Non-renewable): जैसे कोयला, पेट्रोलियम।
- मानव संसाधन
- मानव की संख्या, योग्यता, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि।
- मानव स्वयं संसाधन है जो अन्य संसाधनों का उपयोग करता है।
- मानव निर्मित संसाधन
- जैसे भवन, सड़कें, मशीनें, उपकरण।
प्रमुख प्राकृतिक संसाधन:
- भूमि: सम्पूर्ण जीव जगत का आधार।
- कृषि: भूमि, मृदा और जल इसके मुख्य आधार।
- जल: सिंचाई, उद्योग, घरेलू उपयोग में काम आता है।
- मृदा: पेड़-पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक।
- वन: वायु शुद्ध करते हैं, मिट्टी व जल संरक्षण करते हैं, प्राणवायु (ऑक्सीजन) के स्रोत हैं।
1.4 मानव और पर्यावरण का संबंध व प्रभाव
- मानव और पर्यावरण एक-दूसरे पर निर्भर हैं।
- मानव पर्यावरण से पोषण पाता है और उसी को प्रभावित भी करता है।
- आधुनिक युग में मानव ने औद्योगीकरण, नगरीकरण, तकनीकी विकास से पर्यावरण को असंतुलित कर दिया है।
- वनों की कटाई, जल व वायु प्रदूषण, भूमि क्षरण जैसी समस्याएँ उत्पन्न हुईं।
- परिणामस्वरूप –
- हवा, पानी और भोजन दूषित हो गए।
- धरती बंजर, मरुस्थल बढ़ रहे हैं।
- यह स्थिति मानव के अविवेकपूर्ण दोहन से उत्पन्न हुई है।
1.5 पर्यावरण प्रदूषण के प्रकार व प्रभाव
1. वायु प्रदूषण:
- कारण – कारखानों का धुआँ, वाहनों से गैसें, कीटनाशक, जीवाश्म ईंधन का जलना।
- प्रभाव – आँखों में जलन, फेफड़ों के रोग, अम्लीय वर्षा, ओजोन परत में छेद।
2. अम्लीय वर्षा:
- सल्फर डाइऑक्साइड व नाइट्रोजन गैसें जल वाष्प के साथ मिलकर अम्लीय वर्षा (Acid Rain) बनाती हैं।
- इससे पत्तियाँ गिरती हैं, फसलें झुलसती हैं, पेड़ सूखते हैं।
3. ओजोन छिद्र:
- 20-35 किमी ऊँचाई पर स्थित ओजोन परत सूर्य की हानिकारक किरणों को रोकती है।
- CFC गैसों के उपयोग से इसमें छेद हुआ (पहली बार 1985 में अंटार्कटिका पर)।
- परिणाम – त्वचा कैंसर, पौधों की वृद्धि में कमी, ग्लोबल वार्मिंग।
4. जल प्रदूषण:
- कारण – औद्योगिक अपशिष्ट, कीटनाशक, सीवेज, तेल फैलाव।
- प्रभाव – पेयजल असुरक्षित, मछलियों की मृत्यु, जलजनित बीमारियाँ।
5. ध्वनि प्रदूषण:
- माप की इकाई – डेसीबल (Decibel)।
- स्रोत – यातायात, मशीनें, पटाखे, लाउडस्पीकर।
- प्रभाव – तनाव, चिड़चिड़ापन, बहरापन, नींद में बाधा।
6. मृदा प्रदूषण:
- कारण – रासायनिक खाद, कीटनाशक, प्लास्टिक, औद्योगिक कचरा।
- प्रभाव – भूमि की उर्वरता घटती है, भू-क्षरण व भूस्खलन बढ़ता है।
7. रेडियोधर्मी प्रदूषण:
- कारण – परमाणु परीक्षण, यूरेनियम, प्लूटोनियम जैसे तत्व।
- प्रभाव – कैंसर, अस्थि रोग, बंध्यता, मिट्टी की उर्वरता में कमी।
8. तापीय प्रदूषण:
- कारण – ग्रीनहाउस गैसें, औद्योगिक ऊष्मा, वनाग्नि, ओजोन क्षरण।
- प्रभाव – वैश्विक तापमान वृद्धि, सूखा-बाढ़, कृषि उत्पादन में कमी।
1.6 भूमि के बदलते उपयोग व उसके प्रभाव
कारण:
- जनसंख्या वृद्धि
- औद्योगीकरण
- नगरीकरण
- वनों की कटाई
- बड़े बाँधों का निर्माण
- पर्यटन विकास
प्रमुख प्रभाव:
- प्राकृतिक संतुलन बिगड़ा।
- भूमि की उर्वरता घट गई।
- अनेक जीव-वनस्पति प्रजातियाँ लुप्त हो गईं।
मुख्य तत्व:
- जनसंख्या वृद्धि:
- संसाधनों पर दबाव, बेरोजगारी, प्रदूषण में वृद्धि।
- वन अपरोपण (Deforestation):
- वनों की अंधाधुंध कटाई से भूमि अपरदन, भूस्खलन, मरुस्थलीकरण।
- अतिचारण:
- पशुओं द्वारा अत्यधिक चराई से वनस्पति खत्म, भूमि बंजर।
- अति-खनन:
- मिट्टी क्षरण, भू-स्खलन, जल प्रदूषण, हरियाली में कमी।
- नगरीकरण:
- कृषि भूमि घटती है, अपशिष्ट जमाव, वायु-जल प्रदूषण बढ़ता है।
- औद्योगीकरण:
- वायु, जल, ध्वनि, भूमि और रेडियोधर्मी प्रदूषण बढ़ता है।
- उदाहरण: कोलकाता, दामोदर, हुगली, यमुना आदि नदियाँ प्रदूषित।
- बड़े बाँधों का निर्माण:
- जल संग्रहण लाभकारी परन्तु भूमि डूबना, वन्य जीवों का विनाश और विस्थापन हानिकारक।
- पर्यटन व तीर्थ यात्रा:
- प्राकृतिक स्थलों पर कचरा, प्लास्टिक से पर्यावरण हानि।

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