2.1 पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता
- पृथ्वी पर अनेक प्रकार के पौधे, प्राणी और मानव निवास करते हैं।
- मानव सबसे बुद्धिमान जीव है, पर उसे प्रकृति को नष्ट करने का अधिकार नहीं है।
- आज पर्यावरण असंतुलन विश्व की गंभीर समस्या बन गई है।
- समाधान के लिए सभी को पर्यावरण के प्रति जागरूक बनाना आवश्यक है।
- पर्यावरणविदों, राजनेताओं और नीति-निर्माताओं को मिलकर प्रयास करना चाहिए ताकि संसाधनों का संरक्षण हो सके।
पर्यावरण संरक्षण के लिए आवश्यक कदम:
- जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने हेतु परिवार नियोजन।
- जैव उर्वरक व वर्मी कम्पोस्टिंग का उपयोग।
- सौर ऊर्जा से जल का दोहन।
- खाना पकाने में बायोगैस का प्रयोग।
- नियंत्रित बांधों और जल विभाजकों का निर्माण।
- वृक्षारोपण को प्रोत्साहन।
- फसल चक्र का पालन।
- वन्य जीवों और पौधों का संरक्षण, अभयारण्य और राष्ट्रीय उद्यानों का विकास।
- शिकार और प्लास्टिक के उपयोग पर रोक।
- गैर परंपरागत ऊर्जा (सौर, पवन) का प्रयोग।
- औद्योगिक अपशिष्टों का पुनः चक्रण (Recycling)।
- ध्वनि प्रदूषण पर नियंत्रण और मशीनों का नियमित रखरखाव।
- जनजागरण हेतु वन दिवस, जल दिवस, पर्यावरण दिवस जैसे कार्यक्रम।
2.2 पर्यावरणीय प्रभाव का अध्ययन
- पर्यावरण प्रदूषण रोकने और संसाधनों को नष्ट होने से बचाने की प्रक्रिया को पर्यावरण संरक्षण कहते हैं।
- जनसंख्या वृद्धि, औद्योगीकरण और अविवेकपूर्ण दोहन से प्रदूषण तेजी से बढ़ा है।
- हमें वर्तमान के साथ-साथ भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखना चाहिए।
आवश्यक उपाय:
- परिवार नियोजन
- जैविक कृषि
- बायोगैस, सौर ऊर्जा का उपयोग
- वृक्षारोपण, फसल चक्र, जल प्रबंधन
- वन्य जीवों का संरक्षण
- पुनर्चक्रण और अपशिष्ट नियंत्रण
2.3 पर्यावरणीय प्रभाव अनुमानक (E.I.A.)
पूरा नाम: Environment Impact Assessment (E.I.A.)अर्थ: किसी विकास परियोजना से पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन और मूल्यांकन।
उद्देश्य:
- पर्यावरण को क्षति पहुँचाए बिना विकास करना।
- पर्यावरण की गुणवत्ता बनाए रखना।
- प्रगति को स्थायी (Sustainable) बनाना।
- पर्यावरण के विघटन को रोकना।
- विकास और पर्यावरण में संतुलन स्थापित करना।
ई.आई.ए. के मुख्य तत्व:
- भूमि पर प्रभाव और भूकंप की संभावना।
- जल, मिट्टी, वायु की गुणवत्ता।
- वन्य जीवों और पौधों की संकटग्रस्त प्रजातियाँ।
- शोर प्रदूषण का आकलन।
- सामाजिक-आर्थिक प्रभाव।
- कचरे के पुनः उपयोग और जोखिम विश्लेषण।
- आपदा प्रबंधन की योजना।
ई.आई.ए. के तीन स्तर:
- प्रारंभिक जांच – यह देखना कि परियोजना के लिए ई.आई.ए. आवश्यक है या नहीं।
- तीव्र प्रभाव निर्धारण – परियोजना के मुख्य प्रभावों का अध्ययन।
- विस्तृत प्रभाव निर्धारण – पर्यावरण पर पड़ने वाले सभी पहलुओं का गहन विश्लेषण।
भारत में ई.आई.ए. का कार्य:
- यह कार्य पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा किया जाता है।
- मंत्रालय विभिन्न परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय मूल्यांकन समितियाँ बनाता है।
- ये समितियाँ नदी घाटी, खनन, उद्योग, ताप विद्युत, पर्यटन आदि परियोजनाओं के प्रभाव का आकलन करती हैं।
2.4 चिपको आंदोलन
- चिपको आंदोलन प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का प्रभावी उदाहरण है।
- शुरुआत – 1974, रेणी गाँव (चमोली, उत्तराखंड) में।
- कारण – साइमंड कंपनी को अंगू प्रजाति के वृक्षों को काटने का ठेका मिला था।
- विरोध – ग्रामीणों ने जंगल कटने से रोकने का निर्णय लिया।
- पुरुषों की अनुपस्थिति में गौरा देवी ने महिलाओं को संगठित कर पेड़ों से “चिपककर” वृक्षों की रक्षा की।
- दो दिनों तक महिलाओं ने जंगल की रक्षा की, और ठेकेदार पीछे हट गए।
- बाद में सुन्दरलाल बहुगुणा ने 2800 किमी पदयात्रा कर आंदोलन को गति दी।
- परिणाम:
- सरकार ने 15 वर्षों तक वनों की कटाई पर रोक लगाई।
- वन विकास निगम की स्थापना।
- ठेकेदारी प्रथा का अंत।
- वृक्षारोपण को बढ़ावा।
- भूमि की उर्वरता बढ़ी और वन्यजीवों की रक्षा हुई।
2.5 साइलेंट वैली (Silent Valley)
- स्थान: केरल राज्य में पश्चिमी घाट के नीलगिरि क्षेत्र की दक्षिण-पश्चिमी ढाल पर।
- क्षेत्रफल: लगभग 90 वर्ग किलोमीटर।
- यहाँ से कुन्तीपूजा नदी बहती है।
- यह क्षेत्र दुर्लभ वनस्पति और वन्य जीवों का निवास स्थान है।
विवाद:
- केरल सरकार यहाँ जलविद्युत परियोजना बनाना चाहती थी।
- केन्द्र सरकार ने पुनर्विचार करने को कहा और एम.जी.के. मेनन की अध्यक्षता में समिति गठित की।
- समिति ने पाया कि बांध निर्माण से पर्यावरण को अपूरणीय क्षति होगी।
- परिणाम:
- 1985 में साइलेंट वैली को राष्ट्रीय उद्यान घोषित कर दिया गया।
- दुर्लभ वनस्पति और जीव सुरक्षित किए गए।
2.6 सी.एन.जी. (Compressed Natural Gas)
- सी.एन.जी. एक स्वच्छ, सस्ती और कम प्रदूषण फैलाने वाली गैस है।
- इसका उपयोग मुख्य रूप से वाहनों में किया जाता है।
- दिल्ली उच्च न्यायालय ने सभी बसों, ऑटो रिक्शों में सी.एन.जी. का उपयोग अनिवार्य किया।
- परिणाम:
- दिल्ली विश्व की सबसे बड़ी सी.एन.जी. बस व्यवस्था वाला शहर बना।
- वायु प्रदूषण में कमी आई।
- अब अन्य राज्यों में भी इसके उपयोग पर विचार हो रहा है।
2.7 जल संरक्षण के प्रयास
मध्यप्रदेश का उदाहरण:
- झाबुआ जिले में वनों की कटाई से भूमि की उत्पादकता घट गई, पलायन बढ़ा।
- 1994 में “राजीव गांधी जल संग्रहण मिशन” शुरू हुआ।
- स्थानीय मांग पर स्टॉप डैम और तालाब बनाए गए।
- जल मात्रा में वृद्धि, मृदा क्षरण में कमी, सिंचाई में सुधार हुआ।
- कृषि और पशुधन उत्पादन बढ़ा।
आगे के प्रयास:
- 1999 – “एक पंच एक तालाब” योजना:
- प्रत्येक सरपंच को अपने कार्यकाल में एक तालाब बनाना अनिवार्य।
- 15 महीनों में 3412 तालाबों का पुनर्निर्माण और 500 नए तालाब बने।
- लागत का 25% जनता द्वारा वहन किया गया।
- 2000 – “पानी रोको अभियान”
- छोटे बांधों से जल संग्रहण किया गया।
- लगभग 7 लाख जल संग्रहण क्षेत्र विकसित हुए।
- “गांव का पानी गांव में, खेत का पानी खेत में” कार्यक्रम:
- खेतों में ऊँची मेड़ बनाकर जल संरक्षण किया गया।
- 20,000 ग्राम इससे लाभान्वित हुए।
परिणाम:
- जल संकट से राहत, मिट्टी संरक्षण, रोजगार सृजन और पर्यावरण में सुधार।

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