4.1 अपवाह तंत्र से आशय
- “अपवाह तंत्र” से तात्पर्य किसी क्षेत्र की नदी प्रणाली से है।
- जब कई छोटी धाराएँ मिलकर एक मुख्य नदी बनाती हैं और वह जल के बड़े भाग जैसे झील, समुद्र या महासागर में मिल जाती है, तो इसे अपवाह तंत्र कहा जाता है।
- वर्षा की मात्रा और स्थल की ऊँच-नीच (उच्चावच) के अनुसार अपवाह तंत्र बनता है।
- नदी अपने जल क्षेत्र को प्रवाहित करती है जिसे अपवाह क्षेत्र या द्रोणी कहा जाता है।
- ऊँचा क्षेत्र जो दो अपवाह द्रोणियों को अलग करता है, उसे जल-विभाजक (Water Divide) कहते हैं।
- जब एक नदी दूसरी नदी के जल क्षेत्र को अपने में मिला लेती है, तो इसे नदी अपहरण (River Capture) कहते हैं।
4.2 भारतीय अपवाह तंत्र
भारत की धरातलीय संरचना में भिन्नता के कारण यहाँ की नदियाँ दो प्रमुख वर्गों में बाँटी जाती हैं –
(1) हिमालय की नदियाँ
(2) प्रायद्वीपीय नदियाँ
(1) हिमालय की नदियाँ
- इनमें सालभर जल रहता है, क्योंकि इन्हें वर्षा जल के साथ-साथ हिम के पिघलने से जल आपूर्ति होती रहती है।
- पर्वतीय भागों में ये गहरी घाटियाँ, जलप्रपात, गार्ज और विसर्प बनाती हैं।
- मैदानी भाग में ये जमाव (डेल्टा, गोखुर झील, बाढ़ मैदान) जैसी आकृतियाँ बनाती हैं।
- तीन प्रमुख नदी प्रणालियाँ हैं –
(i) सिंधु नदी तंत्र
- उद्गम: मानसरोवर के पास (तिब्बत में)।
- लंबाई: लगभग 2900 किमी।
- भारत में यह लद्दाख से गुजरती है और पाकिस्तान में जाकर अरब सागर में गिरती है।
- इसकी पाँच प्रमुख सहायक नदियाँ –
- झेलम
- चिनाब
- रावी
- व्यास
- सतलज
इन पाँच नदियों के प्रदेश को ही “पंजाब” कहा जाता है।
- इस नदी का जल पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के दक्षिण-पश्चिमी भाग में सिंचाई हेतु उपयोग होता है।
(ii) गंगा नदी तंत्र
- उद्गम: गंगोत्री हिमानी से।
- लंबाई: लगभग 2500 किमी से अधिक।
- हरिद्वार के पास मैदानी भाग में प्रवेश करती है।
- प्रमुख सहायक नदियाँ –
- यमुना
- घाघरा
- गंडक
- कोसी
- अन्य सहायक नदियाँ – चंबल, केन, बेतवा, सोन, दामोदर।
गंगा मैदान उपजाऊ है और घनी आबादी वाला क्षेत्र है।
- बांध: माताटीला, रिहंद, और अन्य जलाशयों का निर्माण सिंचाई व विद्युत हेतु।
- दक्षिण-पूर्व की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी में डेल्टा बनाती है।
- बांग्लादेश में प्रवेश के बाद ब्रह्मपुत्र से मिलकर मेघना नाम से जानी जाती है।
(iii) ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र
- उद्गम: कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील के पास।
- तिब्बत में इसे सांगपो, भारत में ब्रह्मपुत्र और बांग्लादेश में पद्मा व मेघना कहते हैं।
- भारत में प्रवाह लंबाई – लगभग 1400 किमी।
- सहायक नदियाँ: दिबांग, लोहित, धनश्री, कालांग।
- अधिक वर्षा के कारण इसमें गाद (अवसाद) की मात्रा अधिक होती है जिससे हर वर्ष बाढ़ आती है।
- प्रवाह दिशा बदलते हुए यह बंगाल की खाड़ी में विशाल डेल्टा बनाती है।
(2) प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ
- ये नदियाँ मौसमी हैं (मुख्यतः वर्षा जल पर निर्भर)।
- इनकी लंबाई हिमालय की नदियों से कम होती है।
- अधिकांश नदियाँ पूर्व की ओर बहती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं, केवल दो प्रमुख नदियाँ (नर्मदा और ताप्ती) पश्चिम की ओर अरब सागर में गिरती हैं।
- मुख्य जल विभाजक पश्चिमी घाट है।
(i) नर्मदा नदी
- उद्गम: अमरकंटक पहाड़ी, मध्यप्रदेश।
- लंबाई: 1312 किमी।
- गहरी भ्रंश घाटी में बहती है और खम्भात की खाड़ी (अरब सागर) में गिरती है।
- भेड़ाघाट (जबलपुर) में “धुआंधार जलप्रपात” बनाती है।
(ii) ताप्ती नदी
- उद्गम: सतपुड़ा पर्वत, बैतूल जिला (मध्यप्रदेश)।
- लंबाई: 724 किमी।
- मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात से होकर बहती हुई खम्भात की खाड़ी में गिरती है।
(iii) गोदावरी नदी
- उद्गम: नासिक (महाराष्ट्र)।
- लंबाई: लगभग 1500 किमी।
- महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश से होकर बहती है।
- प्रमुख सहायक नदियाँ – वर्धा, मांजरा, वेनगंगा, पेनगंगा।
इसे “दक्षिण की गंगा” भी कहा जाता है।
(iv) महानदी नदी
- उद्गम: सिहावा (छत्तीसगढ़)।
- लंबाई: 858 किमी।
- प्रमुख राज्य – छत्तीसगढ़, ओडिशा।
- हीराकुंड बांध इस नदी पर स्थित है।
(v) कृष्णा नदी
- उद्गम: महाबलेश्वर (महाराष्ट्र)।
- लंबाई: 1400 किमी।
- महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश में प्रवाहित।
- सहायक नदियाँ – कोयना, भीमा, मालप्रभा, तुंगभद्रा।
- प्रमुख बाँध – अलमाटी व नागार्जुन सागर।
(vi) कावेरी नदी
- उद्गम: कुर्ग की ब्रह्मगिरि पहाड़ियों (कर्नाटक)।
- लंबाई: 760 किमी।
- सहायक नदियाँ – हेमावती, अमरावती, भवानी।
- शिवसमुद्रम जलप्रपात इसी पर है।
- सिंचाई और जलविद्युत दोनों के लिए उपयोगी।
उत्तर और दक्षिण भारत की नदियों में अंतर
| क्रम | उत्तर भारत की नदियाँ | दक्षिण भारत की नदियाँ |
|---|---|---|
| 1 | उद्गम – हिमालय से | उद्गम – पश्चिमी घाट, सतपुड़ा, प्रायद्वीपीय पठार |
| 2 | जल वर्षभर मिलता है (हिम + वर्षा) | जल वर्षा पर निर्भर |
| 3 | गहरी घाटियाँ बनाती हैं | चौड़ी घाटियाँ बनाती हैं |
| 4 | जलप्रपात कम हैं | जलप्रपात अधिक हैं |
| 5 | यातायात के लिए उपयोगी | यातायात हेतु कम उपयोगी |
| 6 | प्रवाह में विसर्प पाए जाते हैं | प्रवाह सरल व नियमित होता है |
4.3 भारत की झीलें
- झीलें वह जलराशि हैं जो चारों ओर से भूमि से घिरी होती हैं।
- झीलें प्राकृतिक और कृत्रिम दोनों प्रकार की होती हैं।
- महत्व: पर्यटन, मछली पालन, जलापूर्ति, नमक उत्पादन आदि।
प्रमुख झीलें:
| झील | राज्य | विशेषता |
|---|---|---|
| बूलर झील | जम्मू-कश्मीर | शीतकाल में जम जाती है |
| लोनार झील | महाराष्ट्र (बुलढाणा) | ज्वालामुखीय उत्पत्ति |
| चिल्का झील | ओडिशा | खारे पानी की झील |
| कोलेरू झील | आंध्रप्रदेश | मीठे पानी की झील |
| पुलीकट झील | तमिलनाडु | तटीय झील |
| सांभर झील | राजस्थान | खारे पानी की झील |
| नैनीताल, भीमताल | उत्तराखंड | हिमानी झीलें |
4.4 भारत के समीपवर्ती समुद्र
- भारत तीन ओर से समुद्रों से घिरा हुआ प्रायद्वीपीय देश है।
- दक्षिण में: हिन्द महासागर
- पश्चिम में: अरब सागर
- पूर्व में: बंगाल की खाड़ी
- भारत और श्रीलंका के बीच: मन्नार की खाड़ी
- गुजरात के तट पर: कच्छ की खाड़ी और खम्भात की खाड़ी
- अंडमान के पूर्व में: अंडमान सागर
4.5 देश की अर्थव्यवस्था में नदियों की भूमिका
- नदियाँ भारत की आर्थिक रीढ़ हैं।
- इनके किनारों पर प्राचीन सभ्यताएँ और नगर विकसित हुए।
- नदियाँ –
- सिंचाई और कृषि के लिए उपयोगी।
- जल विद्युत उत्पादन का प्रमुख स्रोत।
- पेयजल और परिवहन का साधन।
- धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र नदियों के तटों पर बसे हैं।
4.6 नदी प्रदूषण एवं नियंत्रण
- नदियाँ पवित्र मानी जाती हैं, परंतु मनुष्य उन्हें प्रदूषित कर रहा है।
- प्रदूषण के कारण:
- औद्योगिक अपशिष्ट
- घरों का गंदा जल
- मरे हुए जानवर
- जलकुंभी का फैलाव
नियंत्रण के उपाय:
- सरकार द्वारा कानून और प्रतिबंध बनाए गए हैं।
- औद्योगिक अपशिष्टों को सीधे नदी में बहाने पर रोक।
- सीवेज जल का शोधन अनिवार्य किया गया है।
- “नदी स्वच्छता अभियान” जैसे कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।
- जनता को जागरूक किया जा रहा है।

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