संसदीय प्रणाली — विधायिका और कार्यपालिका
प्रश्न 1. पता लगाइए कि आपके राज्य से संसद के प्रत्येक सदन में कितने प्रतिनिधि हैं।
उत्तर:
मेरे राज्य छत्तीसगढ़ से संसद के दोनों सदनों में निम्नलिखित प्रतिनिधि हैं –
- लोकसभा में 11 सदस्य।
- राज्यसभा में 5 सदस्य।
लोकसभा के सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष चुनाव से चुने जाते हैं, जबकि राज्यसभा के सदस्य राज्य विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं।
प्रश्न 2. वे कौन-से तत्व हैं जो भारतीय संसद को ‘जनता की आवाज’ बनाते हैं? यह कैसे सुनिश्चित करती है कि विभिन्न विचारों को सुना जाए?
उत्तर:
भारतीय संसद को ‘जनता की आवाज’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह सीधे जनता का प्रतिनिधित्व करती है।
इसके प्रमुख तत्व हैं –
- सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार – 18 वर्ष से ऊपर प्रत्येक नागरिक को मतदान का अधिकार है।
- प्रत्यक्ष चुनाव – जनता अपने प्रतिनिधियों को लोकसभा के लिए स्वयं चुनती है।
- बहुदलीय प्रणाली – विभिन्न राजनीतिक दल अलग-अलग विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- वाद-विवाद और चर्चा – संसद में विधेयकों और नीतियों पर खुलकर चर्चा होती है।
- प्रश्नकाल – सांसद मंत्रियों से प्रश्न पूछकर जनता की समस्याएँ उठाते हैं।
- संसदीय समितियाँ – ये समितियाँ विधेयकों और नीतियों की जाँच करती हैं।
- भाषाई अनुवाद सुविधा – विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद की व्यवस्था से अलग-अलग राज्यों की आवाज़ सुनी जाती है।
इन सभी माध्यमों से संसद यह सुनिश्चित करती है कि देश के विभिन्न क्षेत्रों, वर्गों और विचारों को सुनने और समझने का अवसर मिले।
प्रश्न 3. आपके विचार से संविधान ने कार्यपालिका को विधायिका के प्रति उत्तरदायी क्यों बनाया?
उत्तर:
संविधान ने कार्यपालिका को विधायिका के प्रति उत्तरदायी इसलिए बनाया ताकि सरकार मनमानी न कर सके और जनता के प्रति जवाबदेह रहे।
इसके कारण –
- कार्यपालिका कानूनों को लागू करती है, इसलिए उसका नियंत्रण आवश्यक है।
- विधायिका जनता द्वारा चुनी जाती है, इसलिए वह जनता की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करती है।
- प्रश्नकाल, चर्चा और अविश्वास प्रस्ताव जैसी व्यवस्थाओं से सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित होती है।
- इससे शक्तियों का संतुलन बना रहता है और लोकतंत्र मजबूत होता है।
इस व्यवस्था से यह सुनिश्चित होता है कि सरकार जनता की सहमति से कार्य करे।
प्रश्न 4. आपके अनुसार केंद्र स्तर पर द्विसदनीय विधायिका क्यों चुनी गई?
उत्तर:
केंद्र स्तर पर द्विसदनीय विधायिका (लोकसभा और राज्यसभा) इसलिए चुनी गई ताकि कानून बनाने की प्रक्रिया अधिक संतुलित और विचारपूर्ण हो।
इसके मुख्य कारण हैं –
- संघवाद की भावना – राज्यसभा राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है।
- विस्तृत विचार-विमर्श – एक सदन में पारित विधेयक पर दूसरे सदन में पुनः चर्चा होती है।
- जल्दबाजी में निर्णय रोकना – दूसरा सदन विधेयक की समीक्षा कर सकता है।
- राष्ट्रीय और क्षेत्रीय हितों का संतुलन – लोकसभा जनता का प्रतिनिधित्व करती है और राज्यसभा राज्यों का।
इस प्रकार द्विसदनीय व्यवस्था से संतुलन, समावेशिता और बेहतर कानून निर्माण सुनिश्चित होता है।
प्रश्न 5. हाल ही में संसद में पारित किसी विधेयक की पूरी प्रक्रिया को समझने का प्रयास कीजिए। जानिए कि वह विधेयक सबसे पहले किस सदन में प्रस्तुत किया गया था। क्या उस पर कोई बड़ी चर्चा या विरोध हुआ था? इस विधेयक को कानून बनने में कितना समय लगा? इसके लिए आप समाचार-पत्रों की पुरानी खबरें, सरकारी वेबसाइटें और लोकसभा की चर्चाएँ देख सकते हैं। आवश्यकता हो तो अपने शिक्षक से सहायता लीजिए।
उत्तर:
हाल ही में संसद द्वारा पारित एक महत्वपूर्ण विधेयक महिला आरक्षण विधेयक, 2023 है, जिसे आधिकारिक रूप से Constitution (One Hundred and Sixth Amendment) Act, 2023 और लोकप्रिय रूप से Nari Shakti Vandan Adhiniyam कहा जाता है।
1. विधेयक सबसे पहले किस सदन में प्रस्तुत किया गया?
यह विधेयक 19 सितम्बर 2023 को लोकसभा में प्रस्तुत किया गया था। इसे कानून मंत्री द्वारा संसद के विशेष सत्र के दौरान पेश किया गया।
2. विधेयक की मुख्य विशेषताएँ
- लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान।
- अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की सीटों में भी 33% आरक्षण।
- यह प्रावधान जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया के बाद लागू होगा।
3. विधेयक के कानून बनने की प्रक्रिया
इस विधेयक ने संसद की सामान्य विधायी प्रक्रिया का पालन किया:
- प्रथम वाचन (प्रस्तुतीकरण) – लोकसभा में विधेयक पेश किया गया।
- द्वितीय वाचन (चर्चा) – सदस्यों ने इस पर विस्तृत चर्चा की।
- मतदान – लोकसभा में भारी बहुमत से पारित हुआ (454 पक्ष में, 2 विपक्ष में)।
- इसके बाद विधेयक राज्यसभा भेजा गया।
- राज्यसभा में भी चर्चा के बाद इसे सर्वसम्मति से पारित किया गया।
- अंत में राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली।
- राजपत्र में प्रकाशित होने के बाद यह कानून बन गया।
4. क्या इस पर बड़ी चर्चा या विरोध हुआ?
हाँ, इस विधेयक पर लगभग 27 वर्षों से चर्चा चल रही थी।
- इसे पहली बार 1996 में संसद में प्रस्तुत किया गया था।
- कई बार यह पारित नहीं हो सका।
- कुछ राजनीतिक दलों ने OBC महिलाओं के लिए अलग आरक्षण की मांग की।
- 2023 में अधिकांश दलों ने इसका समर्थन किया, जिससे यह पारित हो सका।
5. कानून बनने में कितना समय लगा?
- पहली बार प्रस्ताव: 1996
- संसद द्वारा पारित: सितम्बर 2023
- कुल समय: लगभग 27 वर्ष
हालाँकि 2023 में पेश होने के बाद यह कुछ ही दिनों में दोनों सदनों से पारित हो गया।
6. संसद द्वारा हाल ही में पारित किसी कानून का चयन कीजिए। कक्षा को अलग-अलग समूह में बाँटिए- कुछ विद्यार्थी लोकसभा और राज्यसभा के सांसद बनें, कुछ मंत्री बनें जो प्रश्नों के उत्तर दें और कोई राष्ट्रपति की भूमिका निभाए। सभी मिलकर एक लघु नाटिका तैयार करें जिसमें दर्शाया जाए कि एक विधेयक संसद में कैसे प्रस्तुत होता है, कैसे उस पर चर्चा होती है, वह पारित होता है और अंत में राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने पर कानून बन जाता है। एक ‘मॉडल संसद’ का मंचन कीजिए।
उत्तर:
हमने हाल ही में पारित महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) का चयन किया है। इस अधिनियम के अंतर्गत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटों का आरक्षण किया गया है।
नीचे ‘मॉडल संसद’ की लघु नाटिका प्रस्तुत है —
🎭 लघु नाटिका — “विधेयक से कानून तक”
पात्र:
- लोकसभा अध्यक्ष
- राज्यसभा सभापति
- कानून मंत्री
- लोकसभा के सांसद (सत्तापक्ष और विपक्ष)
- राज्यसभा के सांसद
- राष्ट्रपति
दृश्य 1: लोकसभा में विधेयक प्रस्तुत
लोकसभा अध्यक्ष: सदन की कार्यवाही प्रारंभ की जाती है। आज का मुख्य कार्य महिला आरक्षण विधेयक, 2023 पर विचार करना है।
कानून मंत्री:
माननीय अध्यक्ष महोदय/महोदया, मैं महिला आरक्षण विधेयक, 2023 सदन में प्रस्तुत करता/करती हूँ। यह विधेयक महिलाओं को राजनीति में अधिक प्रतिनिधित्व देने के लिए लाया गया है।
दृश्य 2: चर्चा
सांसद (सत्तापक्ष): यह विधेयक महिलाओं को सशक्त बनाएगा और लोकतंत्र को मजबूत करेगा।
सांसद (विपक्ष): हम इस विधेयक का समर्थन करते हैं, लेकिन सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इसका लाभ सभी वर्गों की महिलाओं को मिले।
कानून मंत्री: सरकार सभी सुझावों पर विचार करने को तैयार है।
दृश्य 3: मतदान (लोकसभा)
लोकसभा अध्यक्ष: अब विधेयक पर मतदान होगा। जो सदस्य पक्ष में हैं, कृपया “हाँ” कहें।
(सदस्य: “हाँ”)
लोकसभा अध्यक्ष: बहुमत से विधेयक पारित हुआ।
दृश्य 4: राज्यसभा में प्रक्रिया
राज्यसभा सभापति:
- अब यह विधेयक राज्यसभा में विचारार्थ प्रस्तुत है।
- (चर्चा होती है, सदस्य अपने विचार रखते हैं)
राज्यसभा सभापति: मतदान के बाद विधेयक राज्यसभा से भी पारित हो गया।
दृश्य 5: राष्ट्रपति की स्वीकृति
राष्ट्रपति: संसद द्वारा पारित महिला आरक्षण विधेयक, 2023 को मैं अपनी स्वीकृति प्रदान करता/करती हूँ।
प्रश्न 7. महिला आरक्षण विधेयक, 2023 व्यापक समर्थन के साथ पारित हुआ। इतने लंबे समय तक चर्चा के बाद भी इस विधेयक को पारित होने में 25 वर्ष से अधिक समय क्यों लगा?
उत्तर:
महिला आरक्षण विधेयक, 2023 को पारित होने में लगभग 25 वर्ष का समय इसलिए लगा क्योंकि यह केवल एक साधारण विधेयक नहीं था, बल्कि संविधान संशोधन से संबंधित विषय था। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता थी, जिससे व्यापक राजनीतिक सहमति बनाना आवश्यक हो गया।
सबसे पहले यह विधेयक 1996 में प्रस्तुत किया गया था, लेकिन उस समय विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच इसके स्वरूप को लेकर मतभेद थे। कुछ दलों ने मांग की कि महिलाओं के आरक्षण में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की महिलाओं के लिए अलग से उप-आरक्षण दिया जाए। इस मुद्दे पर सहमति न बन पाने के कारण विधेयक कई बार लंबित रह गया।
इसके अतिरिक्त, समय-समय पर सरकारों की प्राथमिकताएँ बदलती रहीं और संसद में व्यवधान तथा राजनीतिक असहमति के कारण इस पर गंभीर चर्चा आगे नहीं बढ़ पाई। चूँकि यह विषय राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय से जुड़ा था, इसलिए सभी दलों के बीच संतुलन बनाना कठिन रहा।
अंततः वर्ष 2023 में व्यापक समर्थन और राजनीतिक सहमति बनने के बाद यह विधेयक पारित हो सका।
प्रश्न 8. कभी-कभी संसद बाधित हो जाती है और जितने दिनों तक इसे कार्य करना चाहिए, उतना कार्य नहीं कर पाती। आपको क्या लगता है कि इसका कानूनों की गुणवत्ता और लोगों के अपने प्रतिनिधियों के प्रति विश्वास पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
संसद देश की सर्वोच्च विधायी संस्था है, जहाँ कानूनों पर विस्तृत चर्चा और विचार-विमर्श किया जाता है। यदि संसद बार-बार बाधित होती है और पर्याप्त समय तक कार्य नहीं कर पाती, तो इसका कई प्रकार से नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
सबसे पहले, विधेयकों पर पूरी और गंभीर चर्चा नहीं हो पाती, जिससे कानून जल्दबाजी में पारित हो सकते हैं। इससे कानूनों की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है और उनमें त्रुटियाँ रह जाने की संभावना बढ़ जाती है।
दूसरे, प्रश्नकाल और अन्य चर्चाओं के बाधित होने से कार्यपालिका की जवाबदेही कम हो जाती है। सांसदों को मंत्रियों से प्रश्न पूछने और सरकार से स्पष्टीकरण माँगने का अवसर नहीं मिल पाता।
तीसरे, जब जनता देखती है कि उनके चुने हुए प्रतिनिधि व्यवधानों और विवादों में समय व्यर्थ कर रहे हैं, तो उनके मन में लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति विश्वास कम हो सकता है। इससे लोकतंत्र की छवि और मजबूती दोनों प्रभावित होती हैं।
इसलिए आवश्यक है कि संसद में शांतिपूर्ण, अनुशासित और रचनात्मक चर्चा हो, ताकि गुणवत्तापूर्ण कानून बन सकें और जनता का विश्वास लोकतांत्रिक व्यवस्था में बना रहे।
प्रश्न 9. क्या आप विद्यार्थियों के बीच हित समूह बनाकर किसी नीति से संबंधित प्रश्नों की एक सूची तैयार कर सकते हैं, जिन्हें आप
अपने सांसद या विधायक से पूछना चाहेंगे? यही प्रश्न विधायक के स्थान पर सांसद से पूछे जाएँ तो उनमें क्या अंतर होगा? और
यदि सांसद की जगह विधायक से पूछेंगे तो प्रश्न कैसे भिन्न होंगे?
उत्तर:
हाँ, विद्यार्थी एक हित समूह बनाकर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पर्यावरण या विकास जैसी नीतियों से संबंधित प्रश्न तैयार कर
सकते हैं।
(क) विधायक (MLA) से पूछे जाने वाले प्रश्न (राज्य स्तर के विषय)
- हमारे राज्य के सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता सुधारने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
- राज्य में बेरोज़गारी कम करने के लिए कौन-सी योजनाएँ लागू की गई हैं?
- हमारे क्षेत्र में अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति सुधारने के लिए क्या प्रयास हो रहे हैं?
- राज्य सरकार कृषि और किसानों की सहायता के लिए क्या नई योजनाएँ चला रही है?
- हमारे क्षेत्र की सड़कों, बिजली और पानी की समस्याओं को कब तक सुलझाया जाएगा?
विधायक मुख्य रूप से राज्य सूची और समवर्ती सूची के विषयों पर उत्तरदायी होते हैं, जैसे— पुलिस, स्वास्थ्य, कृषि, स्थानीय प्रशासन आदि।
(ख) सांसद (MP) से पूछे जाने वाले प्रश्न (राष्ट्रीय स्तर के विषय)
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति को पूरे देश में प्रभावी रूप से लागू करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
- युवाओं के लिए राष्ट्रीय स्तर पर रोजगार के कौन-से अवसर बढ़ाए जा रहे हैं?
- देश की रक्षा और सीमा सुरक्षा के लिए सरकार क्या नीतियाँ अपना रही है?
- पूरे देश में पर्यावरण संरक्षण के लिए कौन-सी राष्ट्रीय योजनाएँ चलाई जा रही हैं?
- सांसद निधि (MPLADS) का उपयोग हमारे क्षेत्र के विकास में किस प्रकार किया जा रहा है?
सांसद मुख्य रूप से संघ सूची और समवर्ती सूची के विषयों पर उत्तरदायी होते हैं, जैसे— रक्षा, विदेश नीति, रेलवे, संचार आदि।
अंतर स्पष्ट करें:
- विधायक से पूछे जाने वाले प्रश्न स्थानीय और राज्य स्तर की समस्याओं से संबंधित होते हैं।
- सांसद से पूछे जाने वाले प्रश्न राष्ट्रीय स्तर की नीतियों और योजनाओं से संबंधित होते हैं।
- दोनों के कार्यक्षेत्र संविधान में दी गई सूचियों के अनुसार अलग-अलग निर्धारित हैं।
इस प्रकार प्रश्नों में अंतर उनके कार्यक्षेत्र और अधिकारों के आधार पर होगा।
प्रश्न 10. भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका की क्या भूमिका है? यदि हमारे पास स्वतंत्र न्यायपालिका न हो तो क्या हो सकता है?
उत्तर:
भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। न्यायपालिका सरकार का वह अंग है जो कानूनों की व्याख्या
करता है, उनका पालन सुनिश्चित करता है और विवादों का निपटारा करता है।
भारत में न्यायपालिका का सर्वोच्च निकाय Supreme Court of India है, जो संविधान का संरक्षक माना जाता है।
न्यायपालिका की मुख्य भूमिकाएँ:
- संविधान की रक्षा करना – यह सुनिश्चित करना कि संसद या सरकार द्वारा बनाए गए कानून संविधान के अनुरूप हों।
- मौलिक अधिकारों की रक्षा – यदि किसी नागरिक के अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो न्यायालय उसे न्याय प्रदान करता है।
- कानूनों की व्याख्या करना – कानूनों के अर्थ को स्पष्ट करना और विवादों का समाधान करना।
- नियंत्रण और संतुलन बनाए रखना – विधायिका और कार्यपालिका की शक्तियों पर नियंत्रण रखना, ताकि कोई भी अंग अत्यधिक शक्तिशाली न हो जाए।
यदि स्वतंत्र न्यायपालिका न हो तो:
- सरकार मनमाने ढंग से कानून बना और लागू कर सकती है।
- नागरिकों के मौलिक अधिकार सुरक्षित नहीं रहेंगे।
- शक्तियों का संतुलन समाप्त हो जाएगा।
- लोकतंत्र कमजोर पड़ जाएगा।
- लोगों को निष्पक्ष न्याय नहीं मिल पाएगा।
महत्वपूर्ण प्रश्न (Page 139)
प्रश्न 1. भारत की संसदीय प्रणाली क्या है और इसकी संरचना किस प्रकार की गई है?
उत्तर:
भारत की संसदीय प्रणाली एक लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था है जिसमें जनता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है और वही प्रतिनिधि
सरकार का गठन करते हैं। यह प्रणाली जनता की सहमति, उत्तरदायित्व और विचार-विमर्श के सिद्धांतों पर आधारित है। भारत ने अपनी
संसदीय प्रणाली की प्रेरणा ब्रिटेन की प्रणाली से ली है, परंतु इसे अपनी आवश्यकताओं के अनुसार विकसित किया है।
भारत की संसद द्विसदनीय (दो सदनों वाली) है। इसकी संरचना इस प्रकार है—
- राष्ट्रपति
- लोकसभा (निम्न सदन)
- राज्यसभा (उच्च सदन)
लोकसभा के सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष चुनाव के माध्यम से चुने जाते हैं। राज्यसभा के सदस्य राज्यों के निर्वाचित
प्रतिनिधियों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं। राष्ट्रपति संसद का अभिन्न अंग होते हैं और किसी विधेयक के कानून
बनने के लिए उनकी स्वीकृति आवश्यक होती है।
भारत एक संघीय व्यवस्था वाला देश है, इसलिए संसद की संरचना इस प्रकार बनाई गई है कि वह केंद्र और राज्यों के बीच संतुलन
बनाए रख सके।
प्रश्न 2. संसद के प्रमुख कार्य क्या हैं?
उत्तर:
संसद के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं—
(1) संवैधानिक कार्य:
- राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का निर्वाचन करना।
- संविधान में संशोधन करना।
- संविधान के मूल्यों और सिद्धांतों की रक्षा करना।
(2) कानून निर्माण:
- संसद में विधेयक प्रस्तुत करना।
- विधेयकों पर चर्चा, संशोधन और मतदान करना।
- विधेयक को पारित कर उसे कानून (अधिनियम) बनाना।
(3) कार्यपालिका संबंधी उत्तरदायित्व:
- मंत्रिपरिषद को लोकसभा के प्रति उत्तरदायी बनाना।
- प्रश्नकाल के माध्यम से मंत्रियों से प्रश्न पूछना।
- संसदीय समितियों के माध्यम से सरकार के कार्यों की जाँच करना।
(4) वित्तीय उत्तरदायित्व:
- वार्षिक बजट को स्वीकृति देना।
- सरकारी व्यय की निगरानी करना।
- धन विधेयकों को पारित करना।
प्रश्न 3. भारत के संसदीय लोकतंत्र में विधायिका और कार्यपालिका की भूमिकाएँ क्या हैं?
उत्तर:
(क) विधायिका (संसद) की भूमिका:
- देश के लिए कानून बनाना।
- कार्यपालिका की गतिविधियों की निगरानी करना।
- बजट को स्वीकृति देना।
- राष्ट्रीय नीतियों और महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा करना।
(ख) कार्यपालिका की भूमिका:
कार्यपालिका में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद शामिल होते हैं।
- संसद द्वारा बनाए गए कानूनों को लागू करना।
- सरकार का दैनिक प्रशासन चलाना।
- नीतियाँ बनाना और उन्हें क्रियान्वित करना।
- लोकसभा के प्रति उत्तरदायी रहना।
प्रधानमंत्री वास्तविक कार्यकारी प्रमुख होते हैं और मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।
प्रश्न 4. केंद्र और राज्य स्तर पर विधायिका और कार्यपालिका का गठन किस प्रकार किया जाता है?
उत्तर:
(क) केंद्र स्तर पर
विधायिका (संसद):
- राष्ट्रपति
- लोकसभा (प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा चुने गए सदस्य)
- राज्यसभा (अप्रत्यक्ष रूप से चुने गए सदस्य)
कार्यपालिका:
- राष्ट्रपति (संवैधानिक प्रमुख)
- प्रधानमंत्री (वास्तविक प्रमुख)
- मंत्रिपरिषद (प्रधानमंत्री द्वारा चुनी जाती है)
प्रधानमंत्री लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल या गठबंधन के नेता होते हैं। मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।
(ख) राज्य स्तर पर
विधायिका (राज्य विधानमंडल):
- राज्यपाल
- विधान सभा (निम्न सदन)
- कुछ राज्यों में विधान परिषद (उच्च सदन)
राज्य विधानमंडल एकसदनीय या द्विसदनीय हो सकता है।
कार्यपालिका:
- राज्यपाल (संवैधानिक प्रमुख)
- मुख्यमंत्री (वास्तविक प्रमुख)
- मंत्रिपरिषद (मुख्यमंत्री द्वारा चुनी जाती है)
मुख्यमंत्री विधान सभा में बहुमत प्राप्त दल या गठबंधन के नेता होते हैं। राज्य की मंत्रिपरिषद विधान सभा के प्रति उत्तरदायी होती है।

Leave a Reply